भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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है, वह रोग से वैंच भी नहीं सकता ! प्रायः दुराचारी पुरुषों को ही भयङ्कर रोगों का आखेट होना पड़ता है ।

प्राचीन समय में लोगों को प्रायः रोग होते ही नहीं थे । जिसे रोग होता था, वह पापी और नीच समझा जाता था । वह अपने को धर्माचरण और सदाचार से युक्त करता था ।

आज कल लोग वैद्यक-शास्त्र के हितोपदेशों की अवहेलना करने लग गये हैं । ब्रह्मचर्य-युक्त आहार-विहार को छोड़ कर प्रकृति के विरुद्ध चलते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि वे कभी सुखी नहीं रहते । उनके साथ-साथ एक न एक रोग बराबर चलाता रहता है । माना प्रकार की औषधियाँ खाते रहते हैं, पर अपने दुष्कर्म को छोड़ने में असमर्थ रहते हैं । ऐसे लोग कभी आरोग्य-लाभ नहीं कर सकते । हमारे विचार से ब्रह्मचर्य सब औषधियों का पितामह है । जो पुरुष इसका विधिवत् सेवन करता है, वह कभी रोगी नहीं रह सकता । अमृत-सुख्य औषधोपचार करते रहने पर भी, ब्रह्मचर्य का पालन न करने वाला पुरुष, रोग-रहित नहीं हो सकता । किसी रोग को मूल से नाश करना हो, तो उससे छुटकारा पाने तक, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये ।

एक बड़े अनुभव की वैद्य थे । उनका कहना था कि १ वर्ष नियमित ब्रह्मचर्य के पालन से भयङ्कर रोग नष्ट हो सकता है ! सचिकिल्ला का उन्होंने कई रोगियों पर प्रयोग किया और वे सफल निकले । तब से वे उसी की चिकित्सा करते थे, जो उनके आशा-नुसार वीर्य-रक्षा कर सकता था । वे नहीं से वीर्य-नाशक पुरुष को जान लेते थे, और फिर उसको औषधि नहीं देते थे ।