ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य से 'रोग-शान्ति'
करना चाहते हो, तो यह असयन्ते आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य का समुचित पालन किया जाय ।
१२—ब्रह्मचर्य से रोग-शान्ति
जात मार्ग नयः शत्रुः, व्याधिश्च मयामक्षयेत् । अति पुष्टाङ्गं गुक्ताऽपि, सपश्चात्तेन हन्यते ॥
(सूक्ति)
शत्रु और व्याधि को उत्पन्न होने ही नष्ट कर देना योग्य है । क्योंकि इनके बढ़ जाने पर, अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट पुरुष भी इन के द्वारा मारा जाता है ।
इस देश में स्वस्थ पुरुषों और स्त्रियों की संख्या अंगुलियों पर गिनने योग्य हो गई है । अनेक लोग अपने आरोग्य के लिये विविध यज्ञ करते रहते हैं, फिर भी वे अस्वस्थ ही रहा करते हैं । जनता में निस्तेज और निर्बल शरीर वाले मनुष्यों को देख कर एक बार हृदय थाम कर रह जाना पड़ता है । इस रोग-भस्मता का कारण यही है कि लोग ब्रह्मचर्य-भ्रष्ट होकर अपना जीवन बिता रहे हैं, इसी से वे प्रायः रोगी देखे जाते हैं । न्यभिचार और इन्द्रिय-लोलुपता बहुत बढ़ी हो रही है । ब्रह्मचर्य किस पत्नी का नाम है । इसका ध्यान ही नहीं है । हम बल-पूर्वक यह बात कहते हैं कि एक पुरुष, जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला है, उसे रोग नहीं उत्पन्न हो सकता । जिसने, अपने वीर्य का महत्व न समझ कर, उसको अनियमित प्रकार से अपने शरीर से अलग किया