भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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वाली होती थी। इतना ही नहीं, वह स्वस्थ और दीर्घायु भी प्राप्त करती थी। पिता-माता के ही संयोग से सन्तान की उत्पत्ति होती है। इसलिये उनके गुणानुगुणों का उस पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। इस सम्बन्ध में एक आख्यायिका है:—

पितामह ब्रह्मा ने चार पुत्र उत्पन्न किये। उनसे उन्होंने प्रजा की सृष्टि करने को कहा। पर वे अस्तीकार कर गये। इसका कारण यह था कि ब्रह्मा ने सात्विक दृष्टि से उनको उत्पन्न किया था। इसलिये वे ब्रह्मचारी और सतीगुणी हो गये। फिर ब्रह्मा ने और सात पुत्र उत्पन्न किये। वे राजस दृष्टि से उत्पन्न किये जाने के कारण, रजोगुणी और प्रवृत्ति-पारायण हुए। उन्होंने प्रजा की सृष्टि की।

अब पाठक ऊपर की आख्यायिका के पढ़ने से समझ गये होंगे कि जैसी जिसकी मानसिक दृष्टि रहती है; वैसी ही उसकी सन्तान होती है। यदि हम ब्रह्मचारी हैं, तो हमारी सन्तान भी ब्रह्मचर्य-रत होगी। ज्यमिचारी पुरुष की सन्तान कभी अच्छी नहीं हो सकती। जब तक देश में ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन नहीं किया जाता, तब तक सुसन्तान के लिये शताब्दियों तक मीखना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य-पूर्वक गर्भाधान करने वाले कर्चित दी चार पुरुष हों। जो मैथुन सुसन्तान के लिये पुरुष-कार्य समझ जाता था, वह अब अह्वानी पुरुषों की कृपा से ज्यमिचार का अन्न बन गया। यह बड़े परिहास की बात है!

यदि मनोऽनुकूल बालक उत्पन्न करना है—यदि सन्तान को उत्तम और संदुर्गुणी बनाना है—यदि उन्हें दीर्घजीवन-प्रदान