भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

१२१

ब्रह्मचर्य से सुसन्तान

११—ब्रह्मचर्य से सुसन्तान

क्रोडर्यः पुत्रेण जातेन, यो न विद्वान् धार्मिकः ।

( गीति )

उस पुत्र के उत्पन्न होने से क्या लाभ, जो कि न तो विद्वान् है और न धार्मिक हा ?

सबके मन में यही अभिलाषा रहती है कि सन्तान हो, जिससे कि हमारी वंश-शुद्धि हो । वह अच्छी भी हो, जिससे कि हमारा संसार में यश फैले । यह बात सुनी नहीं है । पर बहुत थोड़े लोग हैं, जो नियम-पूर्वक सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं । कितने लोग ऐसे हैं जो मर जाते हैं, पर उन्हें पुत्र-पुत्रियों के मुख-दर्शन का सौभाग्य नहीं प्राप्त होता । कुछ के बच्चे ही बच्चे होते रहते हैं, पर वे जीते नहीं । कुछ के कुछ दिन और वर्षों के लिये होते हैं । कुछ के कुछ दिन जीते भी हैं, तो महा मूर्ख और अनेक दोषों से ग्रसित ।

अब हम अपने मन से पूछते हैं कि इन सब दोषों का क्या कारण है ? तो हमें यही उत्तर मिलता है कि ब्रह्मचर्य का पालन न होना । जब से हमारे देश में ब्रह्मचर्य-प्रणाली उठ गई, तब से हममें इन दोषों का सन्धार हुआ है । इससे पहले कभी ऐसी अवस्था नहीं थी । हमारे श्राद्धि-युक्ति मनोवाञ्छित सन्तान उत्पन्न करते थे । वे सन्तान की कृद्वा से ही मैथुन में प्रवृत्त होते थे । वीर्य-रक्षण के प्रताप से वह शक्ति उत्तकी प्राप्त थी कि वे कभी भी निष्फल नहीं होते थे । उत्तकी सन्तान भी उत्तम आचार-विचार