ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सकता है। जो न्यभिचारी पुरुष हैं, उन्हें भान भी नहीं होता और उनके शरीर में धीरे-धीरे अस्वास्थ्यकर लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, और फिर वे ही बंदते-बढ़ते नाश का कारण बनते हैं।
दिनचर्यां निशाचर्यां, ऋतुचर्यां यथोदिताम्।
आचरन् पुरुषः स्वस्थः सदा तिष्ठति नान्यथा ॥
दिनचर्या, (आतःकाल से सार्यकाल तक के नियमित कर्म) रात्रिचर्या: (सार्यकाल से लेकर प्रभात तक के कृत्य) और ऋतुचर्या (छः ऋतुओं में आहार-विहार के नियम) का चर्चित रीति से पालन करने से ही मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। अन्यथा नहीं!
इन चर्याओं का यथाविधि पालन करना भी ब्रह्मचर्य है। जो ऊपर की तीनों चर्याओं का पालन कर अपने स्वास्थ्य को बिगड़ने नहीं देता, वह पुरुष वास्तव में ब्रह्मचारी है। इन चर्याओं को नियमित रूप से ही करने के लिये ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है। हमारे प्राचीन ब्रह्मचर्याश्रम में इन्हीं को संयमित और निश्चित करने के लिये ब्रह्मचारियों को बहुत समय तक नहीं रहना पड़ता था। फिर वहाँ से गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होकर, इन्हीं चर्याओं का पूर्ण अभ्यास किया जाता था।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य और स्वास्थ्य का, कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ ब्रह्मचर्य नहीं, वहाँ स्वास्थ्य नहीं। जहाँ ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की जाती है, वहाँ स्वास्थ्य के लिये रोना नहीं पड़ता।