भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य से स्वास्थ्थ-रत्ना

“धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ।”

( सूक्ति )

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल कारण आरोग्य ( स्वास्थ्थ ) ही है ।

अब हम वैद्यक मतानुसार स्वास्थ्थ के लक्षण लिखते हैं । इन लक्षणों के विपरीत होने से अस्वस्थ या रोगी सभक्तता चाहिये:-

समदोषः समाश्रित्य, समधातु मलक्रियः ।

प्रसन्नात्येन्द्रिय मनाः, स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥

( महर्षि ब्रह्मृत. )

जिस मनुष्य के तीनों दोष, ( वात, कफ और पित्त ) अंग्रि ( अन्य पचाने और भूल लगाने वाली शक्ति ) धातु ( रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, और वीर्य ) मल और मूत्र आदि उचित अवस्था में हों—जिसके आत्मा, इंद्रिय और मन प्रसन्न तथा अपने अपने कार्यों में लगे हों, वह पुरुष स्वस्थ कहलाता है ।

स्वास्थ्थ की परिभाषा हो चुकी । अब यह देखना है कि भारत-वासियों में कितने लोग स्वस्थ हैं । हमारे विचार से एक भी नहीं, ऊपर के दिखे गये लक्षण कदाचित् ही किसी भाग्यशाली पुरुष में घटते हों । किसी को वात-विकार, किसी में कफ का कोप, किसी में पित्त की विद्रुति, किसी की अग्नि विगड़ी हुई, किसी के रसादि धातुओं में चीणावा, किसी का मल दूषित और किसी के मूत्र अनियमित हो गया है । हमारे विचार से इन सब ठुरे लक्षणों का एक मात्र कारण ब्रह्मचर्य का अभाव है । एक वीर्य-क्षय से अनेक दुर्गुण उत्पन्न हो जाते हैं । हमारे स्वास्थ्थ का सर्वोत्तम साधन ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचारी पुरुष ही उत्तम स्वास्थ्थ का लाभ कर