ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
६—ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
उत्साह और साहस के बिना संसार का एक काम भी सुचारु-रूप से सम्पादित नहीं हो सकता। इन दोनों का निवासस्थान हृदय है। जिसका हृदय जितना ही बलिष्ठ है, वह पुरुष उतना ही उत्साही और साहसी हो सकता है। हृदय का बलवान होना ब्रह्मचर्य के अधीन है। जिसने वीर्य की रक्षा की है, उसमें उत्साह और साहस की छाया हम देख सकते हैं। वीर्य के बिना हृदय कभी पुष्ट नहीं हो सकता। यह बात प्रायः देखने में आती है कि व्यभिचारी पुरुष अतुत्साही और असाहसी होते हैं। अब पाठक समझ गये होंगे कि उत्साह और साहस का एक मात्र मूल वीर्य है—ब्रह्मचर्य का पालन है।
पवन-पुत्र हनुमान जानकी को खोजने के लिये समुद्र पार कर लङ्का में पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहुत दृढ़ता, पर जानकीजी का कुछ भी पता न चला। तब वे बहुत घबड़ाये और बैठ कर विचारने लगे कि यदि जानकी नहीं मिली, तो मैं जी नहीं सकता। मेरे मरने पर सुमित्रा भी मेरे शोक में मर जायँगे। इस प्रकार राम-लक्ष्मणादि सभी एक के शोक में दूसरे मर जायँगे। इन सब बातों के पश्चात् उनको अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान हुआ और इस कारण से उनके हृदय में उत्साह का पुनः सञ्चार हो उठा। उन्होंने विचार कि कठिन से कठिन कार्य उत्साह से सम्पादित हो सकता है। वाल्मीकि-रामायण में उन्होंने उत्साह की बड़ी प्रशंसा की है। अन्य में इसी उत्साह के कारण उन्होंने जानकी को खोज कर ही शांति ली।
भीष्म पितासह काशिदास की अस्त्रा, अम्बिका और अम्बा-