ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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दो आदर्श ब्रह्मचारी
विक्रमं वृत्रहाजद्यादमै जहान्मच्च धर्मराट् । नत्वंहं सत्यमुत्तपट्टुं, व्ययसेयं कथञ्जन ॥
(महाभारत)
चाहे भूमि आपना गुण गन्ध छोड़ दे । जल अपना तरलत्व त्याग दे—सुय अपना तेज छोड़ दे—वायु अपना स्पर्श त्याग दे, इन्द्र पराक्रम रहित हो जाय, और धर्मराज धर्म से विमुख होकर रहें, पर मैं जिस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य को, धारण कर चुका हूँ, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता । इससे बढ़कर और क्या एक सत्य-शील ब्रह्मचारी कह सकता है !
ऊपर के दो आदर्श ब्रह्मचारियों के चरित्र से परम सुख देने वाले 'ब्रह्मचर्य' की महिमा भली भाँति प्रकट होती है । उनके समान यदि एक भी ब्रह्मचारी इस देश में हो जाय, तो उद्धार होने में रक्ष-मात्र सन्देह नहीं ।
अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन करने से ही हनुमान की वर-घर मूर्तियाँ स्थापित कर, पूजन होता है ।
इसी व्रत में सफल होने के कारण श्रीसीताजी के स्नेह-पात्र हुये और उन्हें यह आशीर्वाद मिला—
अजर-अमर गुणनिधि सुत होइ ।
करहि सदा रघुनायक छोइ ॥
(रामचरित मानस)
इसी सर्वोत्तम गुण के कारण श्रीरामचन्द्र जी श्रीमत् के समान श्रेष्ठ मानते रहे । और इसी के एक मात्र कारण से वे 'महावीर' पदवी से विभूषित हुये ।
अचल ब्रह्मचर्य के कारण ही भीष्म का नाम तर्पण में लिया जाता है ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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इसी के कारण वे इच्छा मरणीयुही और महाभारत के रणक्षेत्र में कोई भी उनका सामना न कर सका ।
अतएव महल की इच्छा रखने वाले पुरुषों को चाहिये कि इन दोनों सत्पुरुषों का अनुकरण कर, अपने को वैसा ही बनायें ।
१६---ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य
“आचार्यों ब्रह्मचर्येण, ब्रह्मचारिण निष्ठुते ।”
( भयर्वेद )
आचार्य अपने ब्रह्मचर्य के चल से ब्रह्मचारियों का हित करता है । अर्थात् योग्य बनाता है ।
‘आचार्यः परमः पिता ।’
( सूक्ति )
धार्मिक दृष्टि से आचार्य भी विद्यार्थी का परम पिता होता है ।
प्राचीन समय में ब्रह्मचर्य के अनेक आचार्य हो गये हैं । देव लोग तो ब्रह्मचर्य-श्रव के लिये प्रधान ही माने जाते थे, पर असुर लोग भी विद्वानों की कृपा से, इस महाश्रव का माहात्म्य जानते थे । आचार्यों का यही काम था कि वे स्वयं ब्रह्मचर्य के लिये दृढ़ सङ्कल्प रहते थे और अपने शिष्यों को भी इसका पाठ पढ़ा देते थे । इनमें महादेव भगवान् शङ्कर और दानव-गुरु शुक्र बहुत बड़े थे । अतएव हम इन दोनों के विषय में प्रथक्-प्रथक् वर्णन करते हैं ।
भगवान् शङ्कर परम योगी थे । ये ‘ब्रह्मचर्य’ के अधिष्ठाता
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महाचर्य के दो बड़े श्राचार्य
और शिक्क थे । सुर और असुर इनकी प्रसन्नता के लिये, और वर-दान प्राप्त करने की इच्छा से महाचर्य-व्रत का पालन करते, और वाञ्छित वर पाते थे ।
एक बार की बात है कि ये अपने महाचर्य-व्रत की दृढ़ता के लिये तपस्या कर रहे थे । इन्द्र ने कामदेव को इनके पास तपो-भङ्ग करने के लिये भेजा । वे भी कैलास में पहुँच कर, एक दृष्टि की ओट से अपना बाण, शङ्कर पर चलाये लगे । उनके मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ । वे अपने योग-वल से इसका कारण समझ गये । उन्हें कामदेव के कपट-व्यवहार पर अत्यन्त क्रोध हुआ, और उन्होंने अपना प्रलयङ्कारी रूक्षीय नेत्र खोल दिया । इस घटना का उल्लेख महाकवि कालिदास ने बड़े ही उत्कर्ष-वर्द्धक प्रकार से 'कुमार-सम्भव' में किया है । उसे हम यहाँ देते हैं :—
क्रोधं प्रभो ! संहर संहरति ।
याचद् गिरा खे मरुतां चरन्ति ।
तावत्स्रं वक्षि भिष-नेष-जन्मा ।
भस्मावशेषं मदन स्त्रकार ॥
हे प्रभो ! अपने क्रोध को शान्त कीजिये ! शान्त कीजिये ! जब तक, ये शब्द आकाश-पथ में उँले, तब तक तो शिव के अप्र नेत्र से उत्पन्न—उस अग्नि ने, कामदेव को जला कर भस्म कर डाला, और हाहाकार मच गया । यह तो हुई एक कान्यमयी पौराणिक कथा । अब इसका आध्यात्मिक रहस्य भी सुनिये ! यह जानने ही योग्य है :—
मनुष्य का शरीर ही कैलास है । उसमें योगयुक्त रहने वाला वीर्यमय जीव ही 'शङ्कर' है । मनो-विकार ही 'कामदेव' है
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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और विवेक ही दोष-नाराक 'तीसरा नेत्र'। ब्रह्मचर्य की अवस्था में मनो-विकार उसका अद्युष्टान भङ्ग करता चाहता है, परन्तु जब वह अपनी विवेक-दृष्टि से देखता है, तो यह उसकी काम-दासना तरङ्गण नष्ट हो जाती है।
प्राचीन समय में शुक्राचार्य नाम के एक असुरों के गुह्य थे। वे वीर्य-रक्षा के लिये अनेक उपाय बताते थे। एक बार उनकी शिष्यों को प्रहण कर दानव लोग बड़े वशित हो गये थे। अब तो उनसे देव लोग भी भय-भीत होने लगे। कहा जाता है कि इन आचार्य के पास 'सखीवनी' नाम की एक विद्या थी, जिससे ये सूतक को भी जीवित कर सकते थे। इसीलिये देवों ने अपने 'कच' नामक एक व्यक्ति को उनके पास यह अमौघ ज्ञान प्राप्त करने के लिये भेजा। शुक्राचार्य के प्रताप से इनको भी वह विद्या आ गई। यह सखीवनी-विद्या क्या था, जिसे कि केवल कच ने बड़े परिश्रम-द्वारा प्राप्त किया? वीर्य-रक्षा की प्रकाण्ड प्रणाली, जिन पर चलने से लोग सूतक होने से बच जाते थे। शुक्राचार्य ने एक बार कच को मरने से बचा भी लिया था। वह आख्यान आगे दिया जायगा।
अंब पाठक काम-नाशक 'रुतीय नेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' का अद्भुत भेद समझ गये होंगे।
अम्ब्यास और वैद्यग्य नाम के दो नेत्र हैं। 'रुतीय नेत्र' जो कि मस्तिष्क में है, वह आत्मज्ञान है। उसके सुलने से काम का निर्मूल्य हो जाता है। शिव के पास यही नेत्र था। इसी लिये उन्होंने कामदेव को जला कर चार कर दिया। यदि तुम
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त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या
भी अपने मनोविकारों को जला कर, अपने को शङ्कर बनाता चाहते हो, तो इसी नेत्र को प्राप्त करने का उद्योग करो !
वीर्य की रक्षा करने वाली नियमावली का नाम 'सखीवनी-विद्या' है। जो इसे नहीं जानता, वह सुतक हो जाता है। अर्थात् अपने को विकारों से सुरक्षित नहीं रख सकता। वीर्य-नाश का ही नाम मृत्यु है, जो इस विद्या को नहीं जानता, वह अपने को इस मृत्यु से बचा नहीं सकता। यदि तुम इस शुक्र-संरक्षण-विधि को जानते हो, और इसका अभ्यास भी है, तो तुम स्वयं तो सुरक्षित हुई हो, परन्तु औरों को भी तुम सुतकल से जीवित कर सकते हो। यह तुम्हारे लिये सब से सुख की बात होगी।
ब्रह्मचारियों को चाहिये कि इन दोनों आचार्यों का अनुकरण करें। इन दोनों ने ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये, जो योग्यतायें प्राप्त की थीं, वे सब के लिये और सब कालों में, मनुष्य का हित कर सकती हैं। इन आचार्यों को अपना आचार्य मान कर, साधना में तत्पर हो जायें !
२०—त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या
न्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिमुष्टिबर्धनम् । उर्वरुकमिववन्धनान्मृत्योर्मुञ्चयामासुतात् ॥
( बख्खंद )
हम तीन नेत्र धारण करने वाले उस शिव की उपासना करते हैं, जो ध्यानन्द और आनन्द की दृष्टि करते हैं। वे स्वर्ग नामक
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फल विरोध की भाँति हमें मृत्यु-बन्धन से मुक्त करें, और दीर्घ जीवन दें ।
“ह्येषा सृज्जीवनी-विद्या, सृज्जीवयति, मानवम् ।”
(सृष्टि)
यह सञ्जीवनी नाम की विद्या निश्चय-पूर्वक मनुष्य को भरने से रक्षित रखती है । इसीलिये इसका नाम सृज्जीवनी-पद्म है ।
हमारे मत से प्रत्येक पुरुष भगवान् शंकर और शुकचार्य बन सकता है । शङ्कर का अर्थ है—सुख-कारक । जो अपना तथा ससार का कल्याण करे, वह शङ्कर है । और शुकचार्य का अभि-प्राय है—वीर्य-रक्षक । जो स्वयं वीर्य का संरक्षण करे और संसार को भी वीर्य-रक्षा का उपदेश दे कर, सुधार ।
यह बात छोटे-बड़े प्रायः सभी लोग जानते हैं कि शङ्कर के पास ‘तीन नेत्र’ थे । खामाबिक दो नेत्रों के अतिरिक्त एक विभिन्न नेत्र उनके तलाट में था । इसे वे गुप्त रखते थे । जब जनता में तमोगुण की वृद्धि होती थी, तब वे इसे प्रकट कर, इस से संहार का काम लेते थे । कामदेव के आक्रमण करने पर, उन्होंने इसी के बल से उसे दण्ड कर अपने ब्रह्मचर्य का संरक्षण किया था । इसी नेत्र के कारण दोनों ने उन्हें अपना गुरु मान लिया था, और असुर-समूह उनसे सदा भय-भीत रहता था । यह नेत्र उन्हें मिला कहाँ से था ? ब्रह्मचर्ययुक्त योग-साधन से ! यह तीसरा नेत्र क्या था ?—आत्मज्ञान था !
यदि तुम शङ्कर बनना चाहते हो, तो इस तृतीय नेत्र को प्राप्त करने का प्रयत्न करो । विना इसके तुम अपने मनो-विकारों
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त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या
का कदोपि नाश नहीं कर सकते। मनोविकारों के नष्ट होने से ही मनुष्य अपना तथा संसार का हित कर सकता है। त्रिनेत्र हो जाने पर समस्त दुर्गुणों को भी नष्ट किया जा सकता है। इस प्रलयङ्कारी नेत्र का बड़ा माहात्म्य है। इसी के प्राप्त हो जाने से शिव 'मृत्युञ्जय' भी बन गये थे। तुम भी कामनाशक मृत्युञ्जय बन सकते हो ! इधके वल से तुम्हारा अखण्ड ब्रह्मचर्य तप कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता।
यह बात हम पहले कह आये हैं कि शुक्ल के पास 'सखीवनी-विद्या' थी। इसी के प्रताप से वे असुरों को जीवित कर देते थे। असुर लोग उन्हें आचार्य मानते थे। उन्होंने इसी के प्रयोग से कच नाम के विद्यार्थी को जीवित कर दिया था।
कच बृहस्पतिके पुत्र थे ये सन्नीवनी विद्या सीखने के लिये शुक्ल के पास गये और ब्रह्मचर्य से रह कर विद्या सीखने का निवेदन किया। यह बात असुरों को ज्ञात हुई। इस पर वे जले और कच को मार डाला। पर शुक्लाचार्य ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया।
यह सखीवनी-विद्या क्या थी ? वीर्य-संरक्षण की प्रणाली थी। असुरों ने कई बार कच को मार डाला था। इसका यही अभिप्राय है कि उसे अपने संसर्ग से वीर्य-नाशक—व्यभिचारी बना डाला था। हम कह चुके हैं कि वीर्य-नाश ही मृत्यु है। इसलिये शुक्ल ने कच को वीर्य-रक्षा के उपाय बता कर, उसे सचेत कर दिया। वह पुनः सदाचार से रहने लगा। इसी सखीवनी-विद्या के पा जाने से कच ने देवयानी जैसी सुन्दरी का चिरस्कार अन्त में कर दिया था।
अब पाठक 'त्रिनेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' के उपाख्यानों
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का रहस्य समझ गये होंगे। ब्रह्मचर्य से रहने वाले सदाचारी को 'देव' और वीर्य-नाश करने वाले दुश्चरित्र को 'असुर' समझना चाहिए।
त्रिनेत्र प्राप्त होने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है और सखी-वनी-विद्या से वीर्य-नाश से बहारा होता है। जो ब्रह्मचारी हैं, वे तो मनोविकारों का नाश कर सुरक्षित रहते हैं और जो न्य-भिचारी हैं, वे ब्रह्मचर्य से रहने के लिये उपाय खोजते हैं। अत-एव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या—दोनों को प्राप्त करे। त्रिनेत्र 'आत्मज्ञान' और सखीवनी विद्या—'वीर्य-रक्षा-प्रणाली' है। इन दोनों की प्राप्ति से देव और असुर—दोनों प्रकार के मनुष्यों का बहारा निश्चित है।
२१—अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
सर्वं वेदात्मसिध्यति । 'प्रमाणं परमं श्रुतिः ।'
( यमक्षत्रपुण मनु )
सब कुछ वेद से सिद्ध होता है। कारण यह है कि वेद में सभी प्रकार के विषयों का संग्रह है।
सब से बढ़ कर प्रमाण वेद है। जिस बात का समर्थन वेद में है, वह अन्य ग्रन्थ के प्रमाणों की उपेक्षा नहीं करता।
“इदम्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलाकिक मुपार्थयो वेदयति स.वेदः।”
( साम्प्रकार वायुणाचार्य )
जो इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के नाश करने का संदुपाय बतावे, उसे वेद कहते हैं।
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
इस खण्ड में हम अनेक प्रकार के प्रमाणों और उदाहरणों से ब्रह्मचर्य का महत्व दिखला चुके हैं। अब हम इसे वेद में दिखलाना चाहते हैं। क्योंकि मानवो-सभ्यता के सर्व श्रेष्ठ ग्रन्थ वेद ही हैं।
ब्रह्मचर्य बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। वेद जैसे सार्वभौम ग्रन्थ में इसके आदर्शों की महिमा का वर्णन न होना अत्यन्त असम्भव है !
यों तो प्रायः सभी वैदिक ग्रन्थों में ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में कुछ न कुछ भाव प्रकट किया गया है, पर हमारे अथर्ववेद में तो एक सूक्त का सूक्त ही, इस महत्वपूर्ण विषय से परिपूर्ण है। इस सूक्त का नाम ही 'ब्रह्मचारी' या 'ब्रह्मचर्य-सूक्त' पढ़ गया है। इस सूक्त में सब २६ मन्त्र हैं। इनमें ब्रह्मचारी की महत्ता, कर्त्तव्यशीलता और व्यवहार-निष्ठा—ब्रह्मचर्य की महिमा, कार्यसिद्धि और व्यापकता, एवं आचार्य के धर्म, महत्त्व तथा उपदेश का वर्णन अलङ्कार-मयी भाषा में बड़े सार-गर्भित रूप से किया गया है। यह बड़े काम का है। यदि एक एक कर के भाव सहित सब मन्त्र कण्ठस्थ कर लिये जायें, तो बहुत ही लाभ पहुँच सकता है। पतदर्थ हम सम्पूर्ण सूक्त को अर्थ तथा भावार्थ सहित पाठकों के दिल की दृष्टि से लिख देना चाहते हैं।
आजकल वेदों का विज्ञान-युक्त अर्थ करने वाले बहुत ही कम लोग हैं। इसीलिये अन्गोल अर्थों से लोगों में केवल भ्रम फैल जाता है, और लाभ कुछ नहीं होता। वेदों की साधा अपौरुषेय है, इसलिये देश, काल और पात्र के अनुकूल एक ही श्रृंखा के कई अर्थ हो जाते हैं। पण्डितवर रामण, महीधर, सायण-
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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चार्य, शङ्कराचार्य और स्वामी दयानन्द—जितने भाष्यकार हुये हैं, प्रायः सर्वोंने अपने-अपने मन के अनुकूल अर्थ किया है। 'ऋग्वेद-भाष्य-भूमिका' में पुराने भाष्यों की अनर्थता और उनके भ्रमों का युक्ति-युक्त खण्डन किया गया है और यह बात सिद्ध की गई है कि वेद में विज्ञान-विरुद्ध अर्थ हैं ही नहीं।
हम इस ब्रह्मचर्य-सूक्त का वास्तविक अर्थ काशी के एक विद्वान्-वेदङ्ग-ब्राह्मण से सम्मन्ना चाहते थे, पर खेद है, वे इस कार्य में असमर्थ ज्ञात हुये। और उन्होंने यह भी कहा कि यहाँ की पण्डितमण्डली तो वही पुराना अर्थ करेगी। अतः हमने स्वयं परिश्रम कर, सुसङ्गत भावों के निकालने की चेष्टा की। और उसी पर संतोष किया, चन्हें पाठक स्वयं आगे देखेंगे :—
ब्रह्मचर्य-सूक्त
( १ )
ब्रह्मचारी षांख्यरति रोदसी उभे तस्मिन्देवाः सम्मनसो प्रवर्तत । स द्वाधार प्रथिवीं दिवञ्च स आचार्यं तपसा पिपत्ति ॥
( १ ) ब्रह्मचारी प्रथिवी और आकाश को वश में करता हुआ चलता है। ( २ ) उसमें देव लोग मन के साथ रहते हैं।
( ३ ) वह प्रथिवी और आकाश को धारण करता है और ( ४ ) वह आचार्य को तप से पूर्ण करता है।
( १ ) ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक वस्तुतियों को अपने अधिकार में करने के लिये, सदैव उपयोग करता है।
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
( २ ) इस व्योग-साधन से उसके हृदय में सदगुणों का आविर्भाव होता है।
( ३ ) प्राप्त दिव्य गुणों के प्रभाव से, वह ऊपर के दोनों उच्च उद्देश्यों को प्राप्त करने में दृढ़ हो जाता है।
( ४ ) और इस प्रकार वह योग्य बनकर अच्छी योग्यता से अपने आचार्य को पूर्ण-काम करता है।
ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक सुखों को साधने वाली विद्या का भली भाँति अध्ययन करता है। ज्यों ज्यों अध्ययन करता है, त्यों त्यों उसके हृदय में उत्तम ज्ञान प्राप्त होता है। कुछ समय के अनन्तर, वह विद्वान् बन जाता है, और वह अपने आचार्य के निरन्तर के परिश्रम को भी इस प्रकार सफल करता है।
( २ )
ब्रह्मचारिणं पितरौ देवजनाः
पुण्यदेवा अनुसंयन्ति सर्वै ।
गन्धर्वा एनमन्वायन् वयर्हिश्वत् त्रिशताः ।
पट्सहस्राः सर्वान्तस् देवास्तपसा पिपलि ॥
( १ ) ब्रह्मचारी को पितर, देवजन, अन्य देव और गन्धर्व, सभी लोग अनुसरते हैं। ( २ ) वह अपने तप से ३०, ३०० और ६००० देवों को परिपूर्ण करता है।
( १ ) ब्रह्मचारी के पिता-पितामहदि, झुमैपै पुरवासी तथा गुणशाली लोग, सभी उसका कल्याण चाहते हैं।
( २ ) और वह अपने अनुष्ठान से सर्वज्ञ की दिव्य शक्तियों को विकसित करता है।
ब्रह्मचारी के सभी हितैषी (चाहने वाले) उसकी आशा लगाने
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रहते हैं कि वह अपने व्रत से विचलित न होने पावे । जब उसका ब्रह्मचर्य पूर्ण हो जाता है, और वह विद्या पढ़ लेता है, तब उसका मानसिक और शारीरिक विकास होता है ।
इस मन्त्र में जो देवों की संख्या गिनाई गई है । उसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर में भी सब देवों के अंश हैं । एक भी अङ्ग ऐसा नहीं, जिसमें कि एक न एक प्रकार की दैवी ( प्राकृतिक ) शक्ति न हो । चन्द्रों के आधार पर भव्य जीवित रहता है । चन्द्रों तीन, तीस, तीन सौ और छः सहस्र—गुण, धर्म, योग्यता और विषय के मूल को देव नाम से अभिहित किया ।
( ३ )
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त्रः । तं रात्रौ त्विस्त्वं उदरे विमर्शितं तं जातं द्रष्टुम मिसंन्यस्त देवाः ॥
(१) ब्रह्मचारी को प्राप्त करने वाला आचार्य, उसे अन्तर्गत करता है (२) उसे तीन रात तक अपने उदर में रखता है और (३) उसके उत्पन्न होने पर देव-गण उसे देखने आते हैं ।
(१) आचार्य अपने यहाँ आये हुये ब्रह्मचारी को अपने अधिकार में कर लेता है । वह विना आचार्य की आज्ञा, कुछ भी नहीं कर सकता । अर्थात् ब्रह्मचारी से आज्ञा-पालन करवना है ।
(२) जब तक उस ब्रह्मचारी के त्रिविध अद्यान दूर नहीं हो जाते, तब तक वह उसे अपने संरक्षण में रखता है ।
(३) जब वह सुबोध हो जाता है—उसकी बुद्धि परिपक्व हो जाती है, तब आचार्य उसे अपने वन्यन से मुक्त कर देता है । फिर विद्वान् लोग उसका आदर-सत्कार करते हैं ।
उपनयन-संस्कार के हो जाने पर, ब्रह्मचारी अपने आचार्य के
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
सन्निकट जा कर उससे विद्या पहने की प्रार्थना करता है। वह आचार्य उस ब्रह्मचारी को अपने आश्रम में रहने, तथा निरन्तर अध्ययन करने की आज्ञा देता है। वह उसे क्रमशः आधि-भौतिक, आधिदैविक और अध्यात्मिक—इन तीन दुःखों से बचने के लिये ज्ञानोपदेश करता है। जब वह समझ लेता है कि अब यह ब्रह्मचारी सुयोग्य और परिपक्व-बुद्धि हो गया, तब वह उसे स्वतन्त्र कर देता है। अर्थात् घर जाने की आज्ञा देता है, इस बात से उस ब्रह्मचारी की हित-कामना करने वाले लोग, उससे मिल कर प्रसन्न होते हैं।
( ४ )
इयं समितृष्टिवी-चौर्द्वितीये तान्तरिजं समिधा प्रणति ।
ब्रह्मचारी समिधा मेखलाया अमेण लोकास्तपसाविपत्ति ॥
(१) यह पृथिवी पहली समिधा है। (२) दूसरी समिधा आकाश है, जिससे वह अन्तरिज को प्रसन्न करता है और (३) ब्रह्मचारी समिधा, मेखला, श्रम और तप से लोक को पूर्ण करता है।
(१) पहली 'परा विद्या' है, जिससे भौतिक वस्तुओं का बोध होता है।
(२) दूसरी 'अपरा विद्या' है जिससे अध्यात्मिक अनुभव किया जाता है और जिसके प्राप्त होने पर आत्मानन्द प्राप्त होता है।
(३) और ब्रह्मचारी अपनी विद्या, कटिबद्धता, परिश्रम तथा अनुष्ठान से लोगों को रस करता है।
ब्रह्मचारी अपने आचार्य से भौतिक और अध्यात्मिक विद्यायें सीखता है। अध्यात्मिक ज्ञान हो जाने से उसका आत्मा सन्तुष्ट हो
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जाता है। तत्पश्चात् वह अपने आचार्य से विलग हो कर अपनी विद्या; कठिबद्धता, परिश्रम और अध्यवसाय से समाज-सेवा में लग जाता है। यहीं से उसका सामाजिक जीवन प्रारम्भ होता है।
( ५ )
पूर्वी जाती ब्रह्मयो ब्रह्मचारी, धर्म वस्तान्तपसो दतिष्ठत् । तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्मज्येष्ठं । देवाश्च सर्वे श्रमतेन साकम् ॥
( १ ) ब्रह्म के पहले ब्रह्मचारी होता है। ( २ ) उन्मूला के साथ तप से ऊपर उठता है। ( ३ ) उससे ज्येष्ठ ब्रह्म उत्पन्न होता है और ( ४ ) सब देव अमृत के साथ रहते हैं।
( १ ) ब्रह्मचारी ज्ञान-प्राप्ति के पहले से ब्रह्मचर्य का पालन करता है।
( २ ) वह अपने ब्रह्मतेज के प्रताप से उन्नति करता है।
( ३ ) ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से ही उसे श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त होता है।
( ४ ) और परमोत्तम ज्ञान के होने पर, उसके सभी दिव्य गुण, सुख के साधन बन जाते हैं।
ब्रह्मचारी जब तक विद्याध्ययन न करले, तब तक ब्रह्मचर्य (वीर्य-रक्षण) का यथावत पालन करे। विद्या से ब्रह्मतेज और इस तेज के कारण ही, उसे आत्म-विकास हो प्राप्त सकता है। क्योंकि जिसका आत्मा विकसित होता है, वही पुरुष धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ ज्ञान का अधिकारी है। जो ज्ञानी होता है, उसके सद-गुण उसे निश्चय ही मोच प्राप्त करा देते हैं।
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[अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त]
( ६ )
ब्रह्मचार्येतिसमिधा समिद्धाः कर्णवसानो दौक्षितो दीर्घश्रमश्रुः । ससद्यपति पूर्वंस्माहुत्तरं समुद्रं, लोकान्स्नग्भ्य मुहुर्नारचक्रित् ॥
( १ ) ब्रह्मचारी समिधा से दिग्भूषित, कृष्ण हरिण-चर्म पहनता हुआ और दीर्घ श्रमश्रु को धारण करता हुआ आगे बढ़ता है । ( २ ) वह पूर्व से उत्तर समुद्र तक शीघ्र पहुँचता है और ( ३ ) लोक-संमूह कर के वार-वार उल्लेजित करता है ।
( १ ) ब्रह्मचारी अपने को विद्या से उन्नत करता है । वह काले हरिण का चर्म पहनता है; और मूछदाढ़ी को बढ़ने देता है । वह प्रगति करने के लिये नेष्ठित रहता है ।
( २ ) इस प्रकार वह विद्या का साङ्गोपाङ्ग अध्ययन कर, ज्ञानरूपी समुद्र के आदि से अन्त तक पहुँचता है ।
( ३ ) और संसार के साथ सद्व्यवहार कर, उसे सत्कर्म के लिये उत्साहित करता है ।
ब्रह्मचारी पहले विद्याध्ययन से अपनी उन्नति करता है । काले रंग के भुगुचर्म और बड़े-बड़े केश आदि के धारण करने से उसकी पवित्रता, सरलता और निरभिमानता सूचित होती है । अर्थात् वह शुद्ध और साधु-वैप में रहता है । वह अपनी प्रगति पर विशेष ध्यान देता है । इसी से वह थोड़े ही समय में वेद—वेदाङ्गों के ज्ञान में पारङ्गत हो जाता है । इसके अनन्तर वह कार्यक्षेत्र में पदार्पण करता है । यहाँ वह अपने अनुपम उपदेशों से लोगों में एकता उत्पन्न करता है, और उन्हें सत्कर्म करने के लिये वार-वार उत्साहित करता रहता है । अर्थात् जनता को सुसंस्कृत करना ही उसका ध्येय होता है ।
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( ७ )
ब्रह्मचारी जन्यब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेश्विन्नं विराजम् । गर्भोभूत्वाऽभूतस्य योनाचिन्द्रोह भूत्वाऽसुरां स्ततहं ॥
ब्रह्मचारी लोक, प्रजापति और तेजस्वी परमेश्वर को उत्पन्न करता हुआ, अत्युत्तम के गर्भ में रहकर, इन्द्र हो कर, मिथुन पूर्वक असुरों का नाश करता है ।
जो ब्रह्मचारी प्रजा, राजा और परमात्मा को तुष्ट करने के लिये, सत्कर्म कर रहा था, वही अब ज्ञान के गुरु विषयों से परिपूर्ण हो कर—विद्यानों में श्रेष्ठ बन कर—दुर्गुणों का नाश करता है । अर्थात् संसार को उपदेश देता है ।
ब्रह्मचारी प्रजा, राजा और ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिये ब्रह्मचर्य-पूर्वक विद्या का अध्ययन करता है । इससे सत्कर्म का जन्म-दाता है । क्योंकि इस संसार में राजा, प्रजा और ईश्वर—इन्हीं तीनों के प्रति ही सभी कर्तव्य होते हैं । जब वह विद्या से पूर्ण हो जाता है, तब सुखमय गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर देश, जाति और समाज की योग्य सेवा करता है । वह अपने उत्तम विचारों का प्रचार कर, लोगों के कुसंस्कारों और दुर्गुणों का नाश करता है ।
( ८ )
आचार्यस्ततन्नभस्ती उभे इमे उर्ध्वी गम्भीरो पृथिवीं दिवञ्च । ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी, तस्मिन्देशा सम्मनसो भवन्ति ॥
( १ ) आचार्य बड़े गम्भीर दोनों लोकों—पृथिवी और आकाश को बनाता है । ( २ ) ब्रह्मचारी अपने दप से उनकी
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
रक्षा करता है । और ( ३ ) देव लोग उसके मन के साथ रहते हैं ।
( १ ) आचार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण 'भौतिक और अध्यात्मिक' ज्ञान का उपदेश करता है ।
( २ ) ब्रह्मचारी उनको अपने अनुष्ठित व्रत के साथ हृदय-क्षम करता जाता है ।
( ३ ) और इस प्रकार उसके (ब्रह्मचारी) सभी दिव्य गुण विकसित होते हैं ।
आचार्य ही भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान का कर्ता है । जब वह अपने शिष्य को परिषद बना देता है, तब वह भी उसी की भाँति अपनी प्राप्त विद्या की रक्षा करता है । आचार्य जो कुछ उस (ब्रह्मचारी) को सिखाता है, वह उसे भूलने नहीं देता । ब्रह्मचर्य के प्रतार से उसकी विद्या रक्षित रहती है, समयानुकूल बढ़ती भी जाती है । इसलिये उसके दिव्य गुण सारे संसार में विख्यात होते हैं ।
( ६ )
इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी विज्ञामाजभास प्रथमो दिवक्ष्च । ते कृत्वा समिधा वृषास्ते तयोर्पार्वता भुवनानि विश्वा ॥
( १ ) पहले ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि और आकाश की विद्या ग्रहण की । ( २ ) अब उनको दो समिधायें बनाकर, उपासना करता है । और ( ३ ) इन्हीं के बीच में सब भुवनों की स्थिति है ।
( ४ ) ब्रह्मचारी प्रथमतः भौतिक और आध्यात्मिक विषयों की विद्या प्राप्त करता है ।
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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( २ ) फिर उन परा और अपरा विद्याओं का भजन करता है । जिन्हें आचार्य उसे देता है ।
( ३ ) और इन्हीं दोनों के बीच में सब कुछ भरा पड़ा है । ब्रह्मचारी अपने आचार्य से भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान का भिन्ना लेता है । 'यिद्विक और पारलौकिक' विद्या की प्राप्ति से उसका उद्देश्य सिद्ध हो जाता है । इस यज्ञ के पूर्ण हो जाने पर फिर उसके सारे मनोरथ स्वयं सपते हैं । यही उसकी भिन्ना का आदर्श है ।
( १० )
अर्वागन्यः परोअन्यो दिवस्पृष्टादृगृहानिधी निहितो ब्राह्मणस्य । तीरन्वति तपसा ब्रह्मचारी, तत्केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान् ॥
( १ ) एक पास है और दूसरा आकाश से भी दूर है । वे दोनों कोश ब्राह्मण की गृहा में घरे हुये हैं । ( २ ) ब्रह्मचारी अपने तप से उनकी रक्षा करता है । वह रहस्य ब्रह्म-विद्वान् ही जान सकता है ।
( १ ) भौतिक-ज्ञान पास, और आध्यात्मिक ज्ञान बहुत दूर है । वे दोनों वेद में लिपे हुये हैं ।
( २ ) ब्रह्मचारी अपने तपोऽनुष्ठान से उन दोनों को अपने अधिकार में कर लेता है ।
( ३ ) इन दोनों के रहस्य को ब्रह्मज्ञानी पुरुष ही समुचित जानता है ।
'भौतिक-ज्ञान' से भी कठिन 'ब्रह्म-ज्ञान' है । आचार्य उन दोनों को, अपने शिष्य को बेवाध्ययन से सिखला देता है । वह
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श्रध्दवैद्य में ब्रह्मचर्य-सूत्र
भी संसको फिर किसी प्रकार नष्ट नहीं होने देता । जो पुरुष वेद का ज्ञाता नहीं, उसे यह रहस्य नहीं विदित होता ।
( ११ )
अर्वागन्य इतो श्रान्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभस्ती श्रन्तरेये । तयोः श्रयन्ते रंभयोऽपि दृढा स्तानातिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी ॥
( १ ) यहाँ एक है, और दूसरी इस लोक से बहुत दूर है । ये दोनों अग्नि, पृथ्वी और आकाश के बीच में मिल जाती हैं ।
( २ ) उनकी तीव्र किरणें फैली हैं और ब्रह्मचारी उनको तप से अधिकार में करता है ।
( १ ) कर्म ऐहिक और ज्ञान पारलौकिक—ये दो अग्नि हैं । इन दोनों का मिलाप भौतिक और-आध्यात्मिक साधनों से होता है ।
( २ ) इन दोनों की गति बड़ी तीव्र है, जो सर्वत्र प्रसफुटित होती है । ब्रह्मचारी उन दोनों को अपनी तपसा से साथ लेता है ।
ब्रह्मचारी आचार्य के यहाँ रहकर 'वैदिक कर्म' और 'आत्म-ज्ञान' दोनों की साधना करता है । 'कर्म और ज्ञान'—दोनों में ही गूढ़ तत्व भरा हुआ है । जहाँ ये दोनों मिलते हैं—जहाँ इनका समान रूप से आदर किया जाता है, वहाँ अच्छी प्रगति और सफलता मिलती है । इसी से ब्रह्मचर्य की अवस्था में दोनों का बराबर अनुष्ठान करना पड़ता है ।
( १२ )
अभिक्कन्दु स्तनयजसृणः शितिंगो बृहच्छ्रेपोऽनुभूमी जमात् । ब्रह्मचारी सन्नित्त सनोरेतः पृथिव्या तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः ॥
( १ ) घोर गजना करता हुआ, भूरा और साँवला तथा बड़े
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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आकार वाला मेघ भूमि का पोषण करता है। ( २ ) अपने रेतस से पृथिवी और पर्वत को सींचता है और ( ३ ) उससे चारों दिशायें जीवित होती हैं।
( १ ) चन्द्र स्वर से संसार को सनेत करता हुआ, जल्ल-स्वरूप वाला तथा हृष्ट-पुष्ट अज्ञो पाक्षों वाला ब्रह्मचारी संसार का पालन करता है।
( २ ) वह बड़े से लेकर छोटे तक, सब के हित का उपदेश देता है। अर्थात् वह समष्टि होता है।
( ३ ) और उसके उपदेश से चारों ओर लोगों में जीवन पड़ जाता है। अर्थात् सर्वत्र जागृति उत्पन्न होती है।
इस मन्त्र में ब्रह्मचारी को मेघ बंता कर, उससे उसके कार्यों की तुलना की गई है।
जैसे मेघ भीमनाद करता है, वैसे वेद-घोष करने वाला ब्रह्मचारी भी ओजस्वी व्याख्यान देता है। मेघ के स्वरूप में जो सुन्दरता है, वह उसमें भी है। मेघ जैसे बृहत्काय है, वैसे यह भी हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला होता है। वह पृथिवी का पोषण करता है, यह भी जनता का सुधार करता है। वह अपना जल पर्वत से पृथिवी पर्यन्त बरसाता है। यह भी अपना ज्ञानोपदेश, बड़े-छोटे का भेद-भाव छोड़कर, सब लोगों को समान रूप से देता है। उसकी वर्षा ने चारों दिशाओं में आनन्द होता है। इसकी भी शिक्षा से सर्वत्र सुख ही सुख उत्पन्न हो जाता है। अतः शुभ, चर्म तथा स्तभाव के मिल जाने से, ब्रह्मचारी भी मेघ और मेघ भी ब्रह्मचारी बनता। दोनों में कैसी अच्छी समता दर्शाई गई है !