ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्यामृत
जौहर) वीर्य को नष्ट कर देता है ऐसा वीर्य-हीन (थौथा) मनुष्य अपने सौभाग्य को नष्ट करके दुःखसागर में डूब मरता है।
ब्रह्मचारी का शरीर वज्र के समान होता है। उसकी नस नाड़ियाँ फौलाद (इस्पात) से भी कठोर होती हैं। शरीर दृढ़, सुन्दर और सुडौल होता है। सारे शरीर और मुख-मण्डल पर ऐसी लाली, सुन्दरता (चमक) और तेज आता है कि जिसके दर्शन करके मनुष्य का पेट नहीं भरता। पाठकगण! इस ब्रह्मचर्य के आनन्द को खूब लूटिये और इस पवित्र सन्देश को देश के सब विद्यार्थियों और युवकों तक पहुँचाइये।
ब्रह्मचर्य का शत्रु बाल-विवाह
बाल-विवाह भी तुम्हारे मार्ग में एक भयंकर बाधा है। इस अन्याय के विरुद्ध वीरता से युद्ध करो। इसके कुचक्र में न फँसो। संसार में कोई मूर्ख किसान ऐसा नहीं जो चना-गेहूँ का कच्चा बीज अगले साल की फसल के बोने के लिए रखता हो, किन्तु भारतवर्ष ही एक ऐसा भाग्यहीन देश है जिसमें १६ वर्ष से पूर्व कन्या और २५ वर्ष से पूर्व बच्चों को बाल-विवाह की फाँसी देकर जब कि इनका शरीर और वीर्यादि धातुएँ भी कच्ची होती हैं, इनसे सन्तान पैदा कराई जाती है। फिर सन्तान कौनसी भीम-अर्जन पैदा होती है ? कीड़े-मकौड़े पैदा हो जाते हैं जो संसार में भार बनकर पाप ही बढ़ाते हैं। बाल-विवाह से प्रथम तो सन्तान होती नहीं, होती है तो मरी हुई। यदि जीवित भी हुई तो शीघ्र मर जाती है, जब तक जीती है सदा रोगी रहती है। बाल-विवाह से बढ़कर कोई पाप और अत्याचार संसार में नहीं है किसी को शीघ्र ही विवाह करना हो तो कम से कम लड़के की आयु २५ वर्ष और लड़की की आयु १६ वर्ष से कम न हो। यह अधम और निकृष्ट विवाह हैं। इससे पूर्व विवाह करना अपनी संतान को विषय-भोग की भट्टी में झोंकना है। १७ वर्ष से १६ वर्ष तक की स्त्री और ३० वर्ष से ४० वर्ष तक का-पुरुष विवाह करे मो मध्यम विवाह जानो और २० वर्ष से लेकर २४ वर्ष तक की स्त्री और ४० से ४८ वर्ष तक का पुरुष का विवाह करे तो सर्वोत्तम
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