भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 26 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

ब्रह्मचर्यामृत

प्रतिदिन कूँए के ठण्डे और ताजा जल से रगड़-रगड़कर धर्षन स्नान करें। पहले सिर पर और फिर शरीर के सब अंगों पर पानी डालें, गर्म जल से कभी भूलकर भी नहीं नहाना। नाभि के नीचे खूब ठण्डे जल की धार डालें। इससे स्वप्नदोष दूर होकर वीर्यरक्षा में लाभ होगा। खदर के अँगोछे से पोछकर शरीर को सुखा लें, फिर शुद्ध खदर के सादे वस्त्र धारण करें। ब्रह्मचारी सदैव दोनों समय स्नान करें तो और भी अच्छा है, नहीं तो गरमी के काल में तो अवश्य की दोनों समय नहायें।

६. सन्ध्या तथा प्राणायाम

एकान्त शुद्ध स्थान में ईश्वर का भजन तथा सन्ध्या करें। सन्ध्या से पूर्व तथा जब भी प्राणायाम मन्त्र आये, तो कम से कम तीन-तीन प्राणायाम करें। सदा लम्बे तथा गहरे श्वास लेने का स्वभाव डाले। इससे आयु बढ़ती है। प्राणायाम करने के समय सिद्धासन से बैठें। मूलाधार और नाभि को ऊपर खींचें, इससे स्वप्नदोष आदि विकार दूर होते हैं, वीर्यरक्षा में बड़ी सहायता मिलती है। प्राणायाम ब्रह्मचर्य का सबसे उत्तम साधन है। अथवा यूँ समझिए कि प्राणायाम ब्रह्मचारी का प्राण है। प्राणायाम और सन्ध्या से सब पाप दूर होते हैं तथा मन और इन्द्रियाँ वश में आती हैं। प्राणायाम की पूर्णविधि 'सत्यार्थप्रकाश' के तीसरे समुल्लास और मेरी प्राणायाम पुस्तक में पढ़ें और स्नान, सन्ध्या-यज्ञ आदि के सम्बन्ध में मेरी 'ब्रह्मचारी के साधन' (पाँचवाँ भाग) पुस्तक पढ़ें।

७. व्यायाम

सन्ध्या के पीछे खुली हवा में व्यायाम करें। आसन तथा दौड़ का व्यायाम विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी है। पहले सौ गज की दौड़ आरम्भ करें और शनैः-शनैः एक मील की, फिर इससे भी अधिक का अभ्यास करें। ध्यान रहे कि श्वास सदैव नाक से ही लें। शीर्षासन ब्रह्मचर्य का प्राण है और वीर्यरक्षा का उत्कृष्ट साधन है, किन्तु यह ध्यान रहे कि सिर के नीचे कपड़े की मोटी गद्दी रखें और दौड़ आदि सभी व्यायामों से

१७

Scanned with CamScanner