ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन-सन्देश
को बन्द रखें। बारें पैर पर दबाव रखें। शौच के समय जोर न लगायें और न ही किणछें, बल लगाने से वीर्यनाश हो जाता है। जो मल (टट्टी) स्वयं आजाये, ठीक है। यदि शौच खुलकर नहीं आता और कब्ज रहता है, तो शौच जाने से पूर्व पेट के आसनादि हल्के व्यायाम करें। पेट को खूब हिलायें। पीछे शौच जायें तो मलबद्ध नहीं होगा। सायंकाल ताँबे के पात्र में जल रख दें। उसका प्राःकाल पान करने से शौच ठीक होता है।
शौच दोनों समय प्रातः और सायं अवश्य जायें। मल तथा मूत्र के वेग को कभी नहीं रोकें। इनके रोकन से अनेक रोग हो जाते हैं। मल मूत्र की उष्णता से वीर्यनाश भी हो जाता है। शौच जाते समय जलपात्र अवश्य ही साथ ले जायें। दोनो समय मूत्र-इन्द्रिय तथा गुदा-इन्द्रिय को शुद्ध ठण्डे जल से कई बार मिट्टी लगाकर धोयें। जो सफेद मैल मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर खाल के नीचे जम जाता है उसे जल से साफ कर दें और इन्द्रिय के छिद्र पर, जिससे मूत्र निकलता है ठण्डे पानी की बारीक धार एक-दो मिनट डालें। ऐसा करते समय ईश्वर का चिन्तन करें। विचार शुद्ध रखें। ठण्डे पानी की धार से शरीर में ठण्डक होकर मन की चंचलता दूर होती है और निरन्तर सेवन से स्वप्नदोष भी नहीं होता। जब-जब मूत्र त्याग करें, तब-तब ठण्डे जल से इन्द्रिय को धो डालें। शौच के पीछे हाथ तथा जलपात्र को कई बार मिट्टी लगा-लगाकर धोयें।
प्रातः जागरण, उषःपान, चक्षुःस्नान, शौचादि के विषय में मेरी पुस्तक "ब्रह्मचर्य के साधन" १-२ भाग पढ़ें।
४. दन्त-धावन
कीकर, नीम, मौलसरी किसी एक वृक्ष की दातुन प्रतिदिन किया करें। इससे दाँत-रोग दूर होंगे, पाचन-शक्ति और आँखों की ज्योति बढ़ेगी। दाँतों के सम्बन्ध में पूरे विवरण के लिए मेरी "दन्त-रक्षा" पुस्तक पढ़ें।
५. स्नान
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