ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्यामृत
का पिंजर एम० के० गांधी महात्मा पद को पाता है, तो आप क्या नहीं बन सकते ? सब कुछ बन सकते हैं। इनके जीवन पहले क्या कम गिरे थे ? इतना गिरा हुआ तो कोई ही नवयुवक होता है। इन्हे संसार का सिरमौर किसने बना दिया? सदाचार ने। अन्धकार कितना ही पुराना हो, प्रकाश होते ही भाग जाता है। जो कुचेष्टाओं को छोड़ेगा, ब्रह्मचर्य के नियमों और साधनों का दृढ़तापूर्वक पालन करेगा, उसके सब संकट और दुःख दूर हो जायेंगे और सफल होगा।
ब्रह्मचर्य के साधन
१. प्रातःजागरण
सदैव प्रातः काल चार बजे उठो। उठते ही ईश्वर का चिन्तन करो। फिर अन्य कार्य करो। प्रातः काल उठने से बुद्धि तीव्र होती है। मनुष्य रोगरहित और स्वस्थ रहता है। जो आलसी मनुष्य अमृतवेला में सोता है, स्वप्नदोष आदि रोग उसे ही सताते हैं, क्योंकि गन्दे स्वप्न प्रायः चार बजे के पीछे ही आते हैं। इसलिये चार बजे के पीछे ब्रह्मचर्य-प्रेमियों को नहीं सोना चाहिए।
२. उषःपान तथा चक्षुरस्नान
शुद्ध जल को लेकर मुख में पूरा भरलो—और साथ ही दूसरे जल से आँखों में खूब छींटे दो, फिर कुल्ली करके आठ—दस घूँट जल पी लो। इस जलपान से वीर्य सम्बन्धी रोग नष्ट होता है। बवासीर नहीं होती। अर्जीण (कब्ज) दूर होता है और शौच खुलकर आता है। कामविकार और शरीर की ऊष्णता दूर होती है।
३. शौच
जल पीकर लघुशंका जा कुछ समय के पीछे खुले जंगल में जाकर मलत्याग (शौच) करें। शौच के लिए जितना ग्राम से दूर जायें उतना ही अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख करके बैठें। मुख तथा दाँतों
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