भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्यामृत

राज्य बनायेंगे, फिर से भारत-भूमि को प्राचीन गौरव प्राप्त करायेंगे ऐसी आशा करना उपहास (मजाक) मात्र ही है। हम तो इतने निर्बल हैं कि उठते-बैठते, अँधेरी आती है, जवानी दूर भागती है और बुढ़ापे को बुलाती है। बल शक्ति और सुन्दरता हमारे पास रहती हुई शर्माती है। तेज, साहस, वीरता हमें नगरते कहकर भाग गये हैं हम भारत-माता के सपूत सोये हुए हैं, किन्तु दुनियाँ के सब लोग जाग गये हैं। हमारे देश में पापों की भरमार है और हमारा जीवन दुःखमय और भार है।

किन्तु इसमें हमारा अपराध ही क्या है ? न तो हमें माता-पिता ही धार्मिक मिले और न ही सच्चे गुरुओं की शिक्षा मिली। अरे-भाई कहाँ सच्चे गुरु और जीवन की शिक्षा ? यहाँ तो जैसे मूर्ख किसान प्रातःकाल अपने पशुओं के रस्से खोल देते हैं, वे सायं काल तक भूखे रहें वा प्यासे रहें, किसी की हानि करें वा लाभ करें, कोई देखभाल नहीं, वही बर्ताव, नहीं नहीं, किन्तु उससे भी बुरा, अपने जिगर के टुकड़ों-प्राणों से प्यारे बच्चों के साथ, हमारे माता-पिता करते हैं। न कुछ सीखते हैं, न पढ़ते हैं। कहाँ धर्म और सदाचार की शिक्षा। हम तो गलियों में फिरते-फिरते एवं नीच और दुराचारी साथियों के साथ खेलते कूदते न जाने कितने दुर्गुण (बुराईयों) पल्ले बाँध लेते हैं। बालकों का हृदय कोमल और स्वभाव सरल होता है, कुसंग की दलदल में फँस जाता है। दुर्गुणों को सदगुण समझकर झोली भर लेता है। पहिले-पहिले बुराई भी भलाई लगती है। भला बनने में दुःख और कष्ट भी प्रतीत होता है। यही नहीं, बालक बेचारे को बुराई भलाई का ठीक ज्ञान ही कहाँ होता है ? वह विष को अमृत समझ खा बैठता है।

प्रथम तो माता-पिता ने शिक्षा नहीं दी। दूसरे गली-कूचों के कुसंग की मार पड़ी। तीसरे आजकल के भारतीय स्कूलों में दुर्भाग्यवश अनेक दुराचारी अध्यापक भी आजाते हैं जिनके संग से बच्चे बिगड़ जाते हैं। इसका कारण कुछ तो देश की नैतिक दृष्टि से ही हीन अवस्था है और कुछ यह भी है कि अध्यापकों को बहुत कम वेतन मिलता है जिससे कि अच्छे और बुद्धिमान् व्यक्ति अन्य पदों पर चले जाते हैं। यह सब जानते हैं कि यह अर्थ-युग है। प्राचीन युग के समान केवल निर्वाह-मात्र लेकर सन्तुष्ट हो

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