ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन-सन्देश
जानेवाले ब्राह्मणवृत्ति के अध्यापक आजकल विरले ही होते हैं। जिन्हें कहीं अन्यत्र स्थान नहीं मिलता वे विवश हो स्कूलों में आजाते हैं। अब देश स्वतन्त्र है। राज्य को चाहिए कि अध्यापकों को समुचित वेतन एवं मान दे। इनका कार्य बड़े उत्तरदायित्व का है। अच्छे अध्यापक अवश्य आदरणीय हैं, वे भावी राष्ट्र के नेताओं के निर्माता हैं।
गुण्डे नीच छात्रों के चंगुल से बचना टेढ़ी खीर है। शायद ही कोई सौभाग्यशाली बालक बचता होगा। इनके पवित्र जीवन पर वे भयंकर धब्बे (दाग) लग जाते हैं जो यत्न करने पर अनेक जन्मों तक नहीं धुलते। परमात्मा वह शुभ दिन लाये जब हमारे स्कूल आदि शिक्षणालयों में चरित्र-हीनता और गन्दगी मिटे। यह सच्चे गुरुकुल और शिक्षणालय बनें।
यह एक दुःखी की पुकार और करुण-क्रन्दन (रोना) है। मैं सताए हुए होनहार बालकों और युवकों को एक अमृत पिलाना चाहता हूँ। आपका दुःख है, यही समझ भेंट देना चाहता हूँ। आप श्रद्धा से स्वीकार कर इसका सेवन वा पान करें, यही इसका मूल्य है। यह अचूक और अमोघ औषधि है, इसे खाओ, संजीवनी बूटी है। अन्दर जाते ही सब रोग दूर होंगे, आरोग्यता बढ़ेगी, निर्बलता और पाप चकनाचूर होंगे, सुन्दरता सरसायेगी, बुद्धि भी पराक्रम दिखलायेगी, बल और नवजीवन आयेगा। शरीर पर लाली और मुख पर तेज चम-चमायेगा। इसके सेवन से बूढ़े जवान होंगे, बालक पहलवान होंगे, मूर्ख विद्वान् होंगे। यदि मृत्यु भी आयेगी तो चार ठोकर खाकर दूर जायेगी। नवयुवको! आपको तो वह आनन्द आयेगा जिसको यह वाणी कह नहीं सकती और लेखनी लिख नहीं सकती। यह तो गूँगे के लिए मिश्री का स्वाद है, जो चखेगा सो जानेगा।
आप औषध (नुस्खा) पूछना चाहेंगे।
भाई ! यह किसी टटपूँजिये वैद्य और ऐरे-गरे-नत्थू-खेरे की पिप्सी पिप्साई औषध नहीं, यह एक महान् संदेश है। यह प्राचीन भारत का जीवन-सन्देश हमें गंगा-यमुना की मन-लुभावनी लहरों की अनवरत कलकल ध्वनि से मिलता है। अरण्य की नीरव शून्यता, हिमालय की हिमाच्छादित गुफायें, तपस्वियों के तपस्यामय आश्रम जोर-जोर से
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