भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 26 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 6

ब्रह्मचर्यामृत

चिल्ला-चिल्लाकर सन्देश सुना रहे हैं। कमी है सुननेवालों की। सुनो ! यह आदिसृष्टि का संदेश है। क्या आप भी नहीं समझे ? लो, स्पष्ट सुनलो, कान खोलकर सुनलो। फिर न कहना कि हमें पता नहीं चला, यह वह संदेश है, जो इस युग के विधाता सच्चे आजीवन ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द जी महाराज ने पुनः संसार को दिया। यह संदेश अमर संदेश है। इस पर अमरता की छाप (मोहर) महर्षि ने ही लगाई है। यह अमृतरूपी संदेश है—ब्रह्मचर्य ! ब्रह्मचर्य !! ब्रह्मचर्य !!! इसे सुनो और संसार के कोने-कोने में सुनादो, ब्रह्मचर्यामृत को सारी आयुभर खूब स्वाद ले-लेकर और घूँट-घूँटकर पीओ और इसे पीकर परशुराम, हनुमान, भीष्म, शंकर और दयानन्द के समान अमर होजाओ।

ब्रह्मचर्य क्या है ?

ब्रह्मचर्य क्या है ? जब तक इसे ठीक-ठीक न समझ लिया जाये तब तक इससे पूर्ण लाभ उठाना और ब्रह्मचर्य की रक्षा करना असम्भव है। 'ब्रह्मचर्य' यह दो शब्दों से बना है।

१. ब्रह्म- इसका अर्थ है—ईश्वर, वेद, ज्ञान और वीर्यादि।

२. चर्य-इसका अर्थ है—चिन्तन, अध्ययन, उपार्जन और रक्षण।

इस प्रकार ब्रह्मचर्य के—

१. ईश्वर-चिन्तन, २. ज्ञान (विद्या) उपार्जन,

४. वीर्य-रक्षण आदि अर्थ हुए।

इन सब का परस्पर घनिष्ठ (गहरा) सम्बन्ध है। वैसे ब्रह्मचर्य का नाम लेते ही लोगों के हृदय में वीर्यरक्षा का भाव उठता है। इसी को ही लोग ब्रह्मचर्य समझते हैं, किन्तु एक ही साथ ईश्वरचिन्तन करना, वेद पढ़ना, ज्ञान और विद्या की प्राप्ति करना तथा वीर्यरक्षा करने का नाम ब्रह्मचर्य है। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा नहीं करता और विषय-भोगों में फँसा रहता है, वह वेद का अध्ययन, विद्योपार्जन और ईश्वर-चिन्तन कभी नहीं कर सकता। शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण शक्तिशाली और बलवान् बनाना और किसी प्रकार इनकी शक्तियों का हास और नाश न होने देना ही ब्रह्मचर्य है। इन तीनों में से किसी एक की भी शक्ति का नाश हुआ तो

Scanned with CamScanner