भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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जीवन-सन्देश

वह ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नहीं अधूरा है। अतः शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों को पूर्ण उन्नत और विकसित करो, यह कैसे होगा ? ब्रह्मचर्य पालन से। ब्रह्मचर्य का स्थूल (मोटा) रूप वीर्यरक्षा है।

वीर्य क्या है ?

पहले इसे समझ लें, फिर इसकी रक्षा का प्रश्न होगा। जो भोजन हम प्रतिदिन करते हैं उसका पेट में जाकर पहले रस बनता है जैसे पशुओं के शरीर में दूध बनता है वैसे ही भोजन का असली सार शरीर में रहता है। उसी से रसादि धातुएं बनती हैं। भोजन का जो स्थूल (खराब) भाग होता है, वह मल मूत्रादि गन्दगी के रूप में शरीर से निकलता रहता है। रस फिर से जठराग्नि में पकने के लिए जाता है। इससे पक्कर रक्त बनता है। इसी प्रकार क्रमशः एक के बाद एक, रक्त से माँस (गोरत), माँस से मेद (चर्बी), मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य सातवीं धातु बनती है। प्रत्येक धातु के बनने में पाँच दिन से अधिक समय लगता है। वीर्य के तैयार करने में शरीर के यन्त्रों (मशीन) को विशेष परिश्रम करना पड़ता है। इसमें तीस दिन से अधिक समय लगता है। तब कहीं यह मनुष्य का बीज (वीर्य) तैयार होता है। १०० बूँद रक्त (खून) से एक बूँद वीर्य बनता है। लगभग जो भोजन एक मन की मात्रा में किया जाता है उससे एक सेर रक्त बनता है। एक सेर रक्त से एक तोला से कम वीर्य तैयार होता है। यदि एक तोला वीर्य शरीर से निकल जाये तो एक सेर खून अर्थात् एक मन भोजन का सार नष्ट हो गया। एक बार की कुचेष्टा वा व्यभिचार से जो वीर्य-पात (नष्ट) होता है, वह एक तोले से अधिक ही होता है। एक बार के वीर्य से दस दिन की आयु घटती है, अतः हमारे पूर्वज वीर्यरक्षा में जी-जान से लगे रहते थे। यही तो बात है कि पुराने समय में हमारे देश में १०० वर्ष से पूर्व कोई मरता न था। अकाल वा बालमृत्यु कोई जानता भी न था। यह तो शरीर का बल है। वीर्य की अग्नि मृत्यु के पंखों को भी जला डालती है। जिसका शरीर वीर्य से भरा है, उसे मृत्यु का भय कैसा ? अतः वीर्य की रक्षा करो और भीष्म और दयानन्द के समान मृत्युंजय (मृत्यु को

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