भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्यामृत

जीतने वाला) बनो।

वीर्यरक्षा का प्रताप

१७६ वर्ष का ब्रह्मचारी भीष्म कुरुक्षेत्र के मैदान में वह घमासान युद्ध मचाता है कि प्रतिदिन दस-दस हजार सैनिकों को वीरगति प्राप्त कराता है। ऐसी अवस्था देख सारा पाण्डव-दल घबराता है। पाण्डव योगश्वर कृष्ण को नेता बना भीष्म की शरण में आते हैं। उसी से अपनी विजय का उपाय गिड़गिड़ाकर पूछते हैं। भीष्म की उदारता और धर्मप्रिय से पाण्डवों को उनके मरने का ढँग और रीति मिल जाती है। शिखण्डी को आगे खड़ा करके अर्जुन निहत्थे भीष्म पर तीर बरसाता है और अपनी वीरता के जौहर दिखाता है। भीष्म का शरीर छलनी हो जाता है। वे शरशय्या पर ही लेट जाते हैं। तीरों से बिधे प्रतिदिन रणभूमि में ही पुत्र-पौत्रों को उपदेशामृत का पान कराते थे। मृत्यु बार-बार आती है, किन्तु ब्रह्मचारी से डरकर उल्टे पैरों भाग जाती है, ब्रह्मचारी आज्ञा देता है, अभी शीतकाल है, सूर्य दक्षिणायन में है, लगभग तीन मास पीछे ग्रीष्मकाल में सूर्य उत्तरायण में आयेगा तभी यह ब्रह्मचारी शरीर को छोड़कर स्वर्गधाम को जायेगा। हुआ भी यही, जब तीन मास पीछे ग्रीष्म-ऋतु आई, तभी उन्होंने स्वेच्छा से शरीर छोड़ा और मोक्षपद पाया। आज भी सारे संसार के लोग श्रद्धा से गुण गाते हैं। उनके सन्तान न थी, फिर भी ब्रह्मचर्य के ही तप के कारण सारे जगत् के पितामह (दादा) कहलाते हैं।

सच्चे ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द का आदर्श जीवन भी हमारे सन्मुख है। वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। भयंकर से भयंकर कष्ट हँसते-हँसते सहे। नीच धूर्तों ने भोजन आदि में उन्हें सोलह बार विष खिलाया। धन्य-धन्य ब्रह्मचारी, तेरा तो विष भी कुछ न बिगाड़ सका। तूने हलाहल को भी निष्प्राण कर दिखाया। जब अन्तिम बार जोधपुर में नीच जगन्नाथ व धोलमिश्र ने काँच वा विष मिलाकर ऋषि को दूध पिलाया तो वह फूट-फूट कर शरीर से निकलने लगा। उस अवस्था को देखकर डाक्टर सूरजमल भी घबरा गये और चिल्ला उठे कि ऐसा भयंकर विष दिया गया है कि किसी

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