भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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जीवन-सन्देश

अन्य पुरुष को दिया जाता तो पाँच मिनट में मर जाता। ऋषिवर ! आप तो शरीर की चिन्ता से ऊपर उठ चुके थे, न आपको जीने की इच्छा थी, न मरने का भय। आपने विष देने वाले घातक को बुलाया। उसका पाप उसको समझाया। हे दया के भण्डार ! तूने उसे अपने पास से थैली देकर सपरिवार नेपाल पहुँचाया। धन्य हो ब्रह्मचारी ! तूने मौत भी उधारी नहीं ली। आपने विष देनेवाले का नाम और भेद भी किसी को नहीं बतलाया। इतना ही नहीं, जोधपुर महाराज के नीचे धूर्त डाक्टर अलीमर्दानख़ाँ ने आपको दवाई के रूप में प्रतिदिन जहर पिलाया। प्रतिदिन सौ-सौ दस्त आये। आँत कट-कट कर गिरने लगी, फिर भी आपका मन नहीं घबराया। मृत्यु ने बार-बार आना चाहा तो आपने उसे दुकराकर एक मास तक दूर ही बैठाया। अजमेर की विशाल नगरी में भक्तजनों ने आपको पहुँचाया। दीपामाला आ पहुँची। सबने अपने दीपक जलाये। आपने अपना शरीर रूपी दीपक बुझा दिया, सब भक्तजन रोये और चिल्लाये। आपने अन्तिम समय में योगाभ्यास और प्राणायाम किया। ईश्वर स्तुति की और मन्द-स्वर से वेदमन्त्रों का गान किया, लोग रोये, किन्तु तू हँसा ! 'ईश्वर ! तूने अच्छी लीला की'। तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी इच्छा पूर्ण हो' यह कहकर नश्वर संसार से प्रयाण किया। तूने इस मरी हुई आर्यजाति को जीवन दिया और इसकी डूबती हुई नया को पार लगाया। तेरे इस मृत्यु के दृश्य ने गुरुदत्त को आस्तिक और ईश्वर का सच्चा भक्त बनाया। ब्रह्मचर्य के तप से ही परमपद की प्राप्ति की और मृत्युंजय कहलाया। प्रिययुवको ! तुम भी वीर्य की रक्षा करो, ऋषि के समान अमरपद पाओगे और मृत्युंजय कहलाओगे।

सावधान !

यह वीर्य शरीर में नौ दस साल की आयु में उत्पन्न होना आरम्भ होता है। सोलह वर्ष की आयु में जब वृद्धि अवस्था आरम्भ होती है तब खूब बढ़ता है। जब मनुष्य २५ वर्ष का होता है, तब युवावस्था आरम्भ होती है। तब तक वीर्य तथा सब धातुएँ बढ़ती हैं। यह समय मनुष्य के जीवन में बड़ा

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