भारतकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्यामृत

भयानक है। कुसंग के कारण काम-देवता भी इसी समय मुँह दिखाता है। जो बालक मन के पीछे चलकर कामवासना वा विषय भोग में फँस जाते हैं व अपना सर्वनाश करके सारी आयु रोते और पछताते हैं। उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। दुनिया के सभी रोग उन्हे आ घेरते हैं, उनकी आयु घट जाती है। इस आयु में वीर्य कच्चा होता है। यह इसलिये उत्पन्न नहीं होता कि इससे विषय भोग की इच्छा पूरी की जाये। यह इसलिये उत्पन्न होता है कि इसे फिर से खूब व्यायाम करके शरीर में पचाया जाये और बल और शक्ति का रूप धारण करे, और शरीर का अंग बन जाये। इस वृद्धि की अवस्था में "१६ वर्ष की आयु से पूर्व कन्या और २५ वर्ष से पूर्व की आयु का जो लड़का वीर्यादि धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष और डण्डे से फूटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके पश्चाताप करेगा। पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी नहीं रहेगा।" उसे स्वर्ग समान युवावस्था के दर्शन भी नहीं होंगे। जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो जायेगा। जीवन में वसन्त आने से पूर्व पतझड़ आजायेगा। हाय ! कितने दुःख की बात है कि सारे जीवन में सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए केवल एक बार, एक बार, निश्चय से एक बार ही अवसर मिलता है, यह भाग्यहीन बालक उसे भी खो देता है।

हमारे युवकों की दशा

एक यात्री दूर देश में व्यापार करने के लिए जाता है। मार्ग में निर्जन और वीहड़ जंगल आता है। पथिक चलते-चलते थक जाता है। विश्राम करने के लिये वृक्ष की छाया में सो जाता है। कुछ समय पीछे भूख और प्यास से व्याकुल होकर उठता है। अपनी गठरी देखता है तो भोजन और वस्त्र नहीं मिलते। लंगूर और बन्दरों ने भोजन उठाकर खा लिया। वस्त्र खाली पड़ा है। जलपात्र की ओर जाता है तो उसे भी खाली पाता है। जल भी बन्दरों ने पी लिया। कुछ भूमि पर गिरा दिया। अब कमर से बँधी रुपयों की थैली को देखता है तो वह भी नहीं मिलती। उसी खोज में इधर-उधर दौड़ भाग करता है, कोलाहल करता है और रुदन मचाता है। जिन चोर डाकूओं ने

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