ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन-सन्देश
उसके रुपये लिये थे; वे उसके शोर से पकड़े जाने के भय से आते हैं और उसका मुँह बन्द करने के लिए खूब डण्डे लगाते हैं और वह भूखा-प्यासा लुटा और मुँह पिटा सा रह जाता है। रात्रि हो जाती है। चारों ओर जंगली पशुओं के घुर्घुराने के भयंकर शब्द सुनाई देते हैं। उसे अपनी रक्षा और जीवन का कोई उपाय और मार्ग नहीं दिखाई देता। चारों ओर भय और आतंक का साम्राज्य है, जाये तो कहाँ जाये ? ठीक उस यात्री जैसी अवस्था आज हमारे देश के युवकों की है। कुसंग में फंसकर नष्ट और भ्रष्ट हो रहे हैं। वीर्य का कुछ भी मूल्य नहीं समझते। आँख खुलती है, तब रोते और पछताते हैं।
एक मनुष्य के हाथ में एक शीशी है जिसमें ५०० रुपये का बहुमूल्य इतर है। उससे पूछते हैं कि आप इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है कि गन्दी नाली में डालूँगा। इसी प्रकार एक और मनुष्य जिसके पास एक बहुमूल्य रत्न हीरा है उससे भी पूछते हैं कि इसका क्या करोगे ? वह उत्तर देता है कि इसको बारीक पीसकर मिट्टी में मिलाऊँगा। इन दोनों से भी बढ़कर मूर्ख और पागल हमारे देश के वे नवयुवक और बालक हैं जो वीर्य जैसे अमूल्य-रत्न को जिसकी एक बूँद लाखों रुपयों से भी बढ़कर मूल्यवाली है, रात-दिन अपने हाथों से हस्त-मैथुन, पशुमैथुन, गुदा-मैथुन आदि पापों के द्वारा गन्दी नालियों में डालते हैं। यदि इसकी रक्षा करके ठीक समय पर खर्च किया जाये तो हनुमान्, भीष्म, दयानन्द, गांधी, सुभाष जैसे देवताओं को जन्म लेना पड़े।
दुःखभरी घटना
किन्तु कुसंग में फंसकर हमारे बच्चे किस प्रकार नष्ट होते हैं, यह दिखाने के लिए एक सच्ची घटना आपको सुनाता हूँ। नाम लेना अच्छा नहीं। स्कूल के विद्यार्थी ने अपनी करुणाजनक, दुःखभरी सच्ची कहानी सुनाई।
“मैं जिस समय आठ वर्ष का था, कुसंग में फँस गया। कई साथी स्वयं भी कुटेबों (कुचेष्टाओं) में फँसे हुए थे। मुझे भी वह गुप्त पाप
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