भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ब्रह्माण्ड पुराण

(प्रथम खण्ड)

।। कृत्य-समुद्देश्य ।।

नमोनमः क्षये सृष्टौ स्थितौ सत्त्वमयाय वा ।
नमो रजस्तमः सत्त्वत्रिरूपाय स्वयंभुवे ॥१
जितं भगवता तेन हरिणा लोकधारिणा ।
अजेन विश्वरूपेण निर्गुणेन गुणात्मना ॥२
ब्रह्माणं लोककर्त्तारं सर्वज्ञमपराजितम् ।
प्रभुं भूतभविष्यस्य साम्प्रतस्य च सत्पतिम् ॥३
ज्ञानमप्रतिमं तस्य वैराग्यं च जगत्पतेः ।
ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सद्भिः सेव्यं चतुष्टयम् ॥४
इमान्नरस्य वै भावान्नित्यं सदसदात्मकान् ।
अविनश्यः पुनस्तान्वै क्रियाभावार्थमीश्वरः ॥५
लोककृल्लोकतत्त्वज्ञो योगमास्थाय योगवित् ।
असृजत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥६
तमहं विश्वकर्म्माणं सत्पति लोकसाक्षिणम् ।
पुराणाख्यानजिज्ञासुर्गच्छामि शरणं विभुम् ॥७

संसार के सृजन, उसके पालन अथवा उसके संहार काल में सत्व स्वरूप वाले के लिए बारम्बार नमस्कार है । रजोगुण-तमोगुण और सत्व-गुण के तीन स्वरूप वाले भगवान् स्वयम्भू के लिए नमस्कार है ।१। जन्म न धारण करने वाले, विश्व के स्वरूप वाले, गुणों से रहित और गुणों के रूप वाले, विश्व के स्वरूप वाले, गुणों से रहित और गुणों के रूप वाले, लोकों के धारण करने वाले उन भगवान् हरि ने जय प्राप्त किया है ।२। समस्त