भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

लोकों के रचने वाले, सबके ज्ञाता, पराजित न होने वाले, भूत-भविष्यत् और वर्त्तमान काल के प्रभु सत्पति ।३। अनुपम ज्ञान के स्वरूप और उन जगतों के स्वामी का ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्यं और धर्मं ये चारों सत्पुरुषों के द्वारा सेवन करने के योग्य हैं ।४। नित्य ही भले और बुरे स्वरूप वाले मनुष्य के इन भावों की क्रिया के भाव के लिए ईश्वर ने फिर रचना की थी ।५। लोकों की रचना करने वाले और लोकों के तत्वों के ज्ञाता, योग के जानने वाले भगवान् ने योग में समास्थित होकर समस्त स्थावर (अचर) और जङ्गम (चर) जीवों की रचना की थी ।६। पुराण के आख्यान की इच्छा वाले मैंने व्यापक सत्पति लोकों के साक्षी विश्वकर्मा उन प्रभु की शरण ग्रहण की है ।७।

पुराणं लोकतत्त्वार्थमखिलं वेदसंमितम् । प्रशशंस स भगवान् वसिष्ठाय प्रजापतिः ॥८ तत्त्वज्ञानामृतं पुण्यं वसिष्ठो भगवानृषिः । पौत्रमध्यापयामास शक्तेः पुत्रं पराशरम् ॥६ पराशरश्च भगवान् जातूकर्ण्यमृषि पुरा । तमध्यापितवान्दिव्यं पुराणं वेदसंमितम् ॥१० अधिगम्य पुराणं तु जातूकर्ण्यो विशेषवित् । द्वैपायनाय प्रददौ परं ब्रह्म सनातनम् ॥११ द्वैपायनस्ततः प्रीतः शिष्येभ्यः प्रददौ वशी । लोकतत्त्वविधानार्थं पंचभ्यः परमाद्भुतम् ॥१२ विख्यापनार्थं लोकेषु बह्वर्थं श्रुतिसंमतम् । जैमिनिं च सुमन्तुं च वैशंपायनमेव च ॥१३ चतुर्थं पैलवं तेषां पंचमं लोमहर्षणम् । सूतमद्भुतवृत्तान्तं विनीतं धार्मिकं शुचिम् ॥१४

लोकतत्व के अर्थ वाले, वेद के समान सम्पूर्ण पुराण की भगवान् प्रजापति ने वसिष्ठ मुनि के आगे प्रशंसा की थी अर्थात् उनको पढ़ाया था ।८। भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने परम पुण्यमय अमृत के सदृश इस तत्व ज्ञान को शक्ति के पुत्र अपने पौत्र पराशर को पढ़ाया था ।६। प्राचीन काल में

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