भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कृत्य-समुद्देश्य ] [ ७

भगवान् पराशर ने इस परम दिव्य और वेद के ही सदृश पुराण को जातू- कर्ण्य ऋषि को पढ़ाया था ।१०। विशेष ज्ञान रखने वाले जातूकण्ण ऋषि के इसका ज्ञान प्राप्त करके इस सनातन पर ब्रह्म को द्वैपायन के लिए प्रदान किया था ।११। परम संयमी द्वैपायन ऋषि ने अत्यधिक प्रसन्न होकर अत्यन्त अद्भुत इस पुराण को लोक तत्व के विधान के लिए अपने पाँच शिष्यों को दिया था अर्थात् पढ़ाया था ।१२। विपुल अर्थों से समन्वित श्रुति के समान इसके लोकों में विख्यापन के लिए पढ़ाया था जिनमें जैमिनि, सुमन्तु और वैशम्पायन थे ।१३। चौथे पैलव और पाँचवें लोमहर्षण थे । सूत परम विनम्र, धार्मिक और पवित्र थे अतः उनको यह अद्भुत वृत्तान्त वाला पुराण पढ़ाया था ।१४।

अधीत्य च पुराणं च विनीतो लोमहर्षणः । ऋषिणा च त्वया पृष्टः कृतप्रज्ञः सुधार्मिकः ॥१५॥ वसिष्ठश्चापि मुनिभिः प्रणम्य शिरसा मुनीन् । भक्त्यो परमया युक्तः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥१६॥ अवाप्तविद्यः सन्तुष्टः कुरुक्षेत्रमुपागमत् । सत्रे सवितते यत्र यजमानान्ऋषीञ्शुचीन् ॥१७॥ वियेनोह्संगसंम्य सत्रिणो रोमहर्षणम् । विधानतो यथाशास्त्रं प्रज्ञयातिजगाम ह ॥१८॥ ऋषयश्चापि ते सर्वे तदानीं रोमहर्षणम् । दृष्ट्वा परमसंहृष्टाः प्रीताः सुमनसस्तथा ॥१९॥ सत्कारैरर्चयामासुरर्घ्यपाद्यादिभिस्ततः । अभिवाद्य मुनीन्सर्वान् राजाज्ञामभिगम्य च ॥२०॥ ऋषिभिस्तैरनुज्ञातः पृष्टः सर्वमनामयम् । अभिगम्य मुनीन्त्सर्वांस्तेजो ब्रह्म सनातनम् । सदस्यानुमते रम्ये स्वास्तीर्णे समुपाविशत् ॥२१॥

परम विनयी लोमहर्षण मुनि ने इस परम श्रेष्ठ पुराण का अध्ययन करके जब समाप्त किया था तो ऋषि आपने उनसे पूछा था जो कि भली प्रकार से धर्म के समाचरण करने वाले और परम प्रज्ञावान् थे ।१५। अनेक