संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मुनियों के साथ संयुत होकर समस्त मुनियों को शिर झुकाकर प्रणाम किया था और परम भक्ति भाव से युक्त होकर प्रदक्षिणा की थी ।१६। सम्पूर्ण विद्या को प्राप्त करके ये परम सन्तुष्ट हुए और फिर वे कुरुक्षेत्र में पहुँच गये थे । जहाँ पर एक विशाल यज्ञ होरहा था और पवित्र बहुत से यजमान तथा ऋषिगण विद्यमान थे ।१७। सब याज्ञिकों ने परम नम्रता से रोमहर्षण ऋषि से भेंट की थी । शास्त्रों के अनुसार विधि पूर्वक प्रज्ञा से अतिगमन किया था ।१८। उस समय में उन समस्त ऋषियों ने भी रोमहर्षण मुनि का दर्शन प्राप्त कर अत्यन्त हर्ष प्राप्त किया था और सबके मन में विशेष प्रसन्नता हुई थी ।१९। सब ऋषियों ने उनका विशेष समादर एवं सत्कार करके अर्घ्यपाद्य आदि के द्वारा उनका समर्चन किया था । राजा के द्वारा आज्ञा प्राप्त करके समस्त मुनिगणों को प्रणाम किया था ।२०। कुशल-क्षेम पूछे जाने पर समस्त ऋषियों के द्वारा आज्ञा प्राप्त की थी । सनातन ब्रह्म के तेज स्वरूप उन सब ऋषियों के समीप जाकर सदस्यों के द्वारा अनुमत अपने आसन पर विराजमान हो गये थे ।२१।
उपविष्टे तदा तस्मिन्मुनयः शंसितव्रताः ।
मुदान्विता यथान्यायं विनयस्थाः समाहिताः ॥२२
सर्वे ते ऋषयश्चैनं परिवार्य महाव्रतम् ।
परमप्रीतिसंयुक्ता इत्यूचुः सूतनंदनम् ॥२३
स्वागतं ते महाभाग दिष्ट्या च त्वां निरामयम् ।
पश्याम धीमन्नत्रस्थाः सुव्रतं मुनिसत्तमम् ॥२४
अशून्या मे रसाद्यैव भवतः पुण्यकर्मणः ।
भवांस्तस्य मुनेः सूत व्यासस्यापि महात्मनः ॥२५
अनुग्राह्यः सदा धीमाञ् शिष्यः शिष्यगुणान्वितः ।
कृतबुद्धिश्च ते तत्त्वमनुग्राह्यतया प्रभो ॥२६
अवाप्य विपुलं ज्ञानं सर्वतश्छिन्नसंशयः ।
पृच्छतां नः सदा प्राज्ञ सर्वमाख्यातुमर्हसि ॥२७
तदिच्छामः कथां दिव्यां पौराणीं श्रुतिसंमिताम् ।
श्रोतुं धर्मार्थयुक्तां तु एतद्व्यासाच्छ्रुतं त्वया ॥२८