संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृत्य-समुद्देश्य ] [ ६
एवमुक्तस्तदा सूतस्त्वृषिभिर्विनयान्वितः । उवाच परमप्राज्ञो विनीतोत्तरमुत्तमम् ॥२६
उस समय में उनके अपने आसन पर बैठ जाने पर समस्त मुनियों ने व्रत धारण किया था और परम प्रसन्न होकर विनीत भाव से सावधान होकर उचित स्थान पर वे सब स्थित हो गये थे ।२२। उन समस्त ऋषियों ने महान् व्रत धारण करके परम प्रीति से समन्वित होकर उन सूतनन्दन जी से पूछा था ।२३। हे महान् भाग वाले ! हम सब आपका स्वागत करते हैं। हे धीमन् ! यहाँ पर स्थित हुए हम सब परम कुशल, सुन्दर व्रतधारी और मुनियों में परम श्रेष्ठ आपका हम दर्शन कर रहे हैं ।२४। पुण्य कर्मों वाले आपके पदार्पण से आज ही यह भूमि हमारे लिए आनन्दमयी हुई है । हे सूतजी ! आप तो महान् आत्मा वाले उन श्रीव्यासजी के कृपा पात्र हैं ।२५। व्यासदेव जी के आप अनुग्रह के योग्य शिष्य हैं और सदा शिष्य में होने वाले गुण-गणों से युक्त हैं तथा परम बुद्धिमान् हैं। हे प्रभो ! आप बुद्धि से युक्त हैं और गुरुदेव के अनुग्रह के पात्र होने से आपको सम्पूर्ण तत्त्व ज्ञान है ।२६। आपने बहुत अधिक ज्ञान की प्राप्ति की है अतः आपके सभी प्रकार के संशय दूर हो गये हैं। हे प्राज्ञ ! हम लोग अब पूछ रहे हैं अतएव सभी कुछ हमारे सामने वर्णन करने के योग्य होते हैं ।२७। हम लोग सब श्रुति सम्मित परमदिव्य पुराण सम्बन्धिनी कथा का श्रवण करना चाहते हैं । आपने इस इसका श्रवण व्यासदेव जी से किया है उसी धर्मार्थ से युक्त पौराणिक कथा को हम सुनना चाहते हैं ।२८। उस समय में जब इस प्रकार के ऋषियों के द्वारा कहा गया तो विनय से संयुत और परम पण्डित सूतजी ने उत्तम विनीत उत्तर दिया था ।२६।
ऋषेः शुश्रूषणं यच्च तस्मात्प्रज्ञा च या मम । यस्माच्छुश्रूषणार्थं च तत्सत्यमिति निश्चयः ॥३० एवं गतेऽर्थे यच्छक्यं मया वक्तुं द्विजोत्तमाः । जिज्ञासा यत्र युष्माकं तदाज्ञातुमिहार्हथ ॥३१ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो मधुरं तस्य भाषितम् । प्रत्यूचुस्ते पुनः सूतं बाष्पपर्याकुलेक्षणम् ॥३२ भवान् विशेषकुशलो व्यासं साक्षात्तु दृष्टवान् । तस्मात्त्वं संभवं कृत्स्नं लोकस्येमं विदर्शय ॥३३