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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

कृत्य-समुद्देश्य ] [ ६

एवमुक्तस्तदा सूतस्त्वृषिभिर्विनयान्वितः । उवाच परमप्राज्ञो विनीतोत्तरमुत्तमम् ॥२६

उस समय में उनके अपने आसन पर बैठ जाने पर समस्त मुनियों ने व्रत धारण किया था और परम प्रसन्न होकर विनीत भाव से सावधान होकर उचित स्थान पर वे सब स्थित हो गये थे ।२२। उन समस्त ऋषियों ने महान् व्रत धारण करके परम प्रीति से समन्वित होकर उन सूतनन्दन जी से पूछा था ।२३। हे महान् भाग वाले ! हम सब आपका स्वागत करते हैं। हे धीमन् ! यहाँ पर स्थित हुए हम सब परम कुशल, सुन्दर व्रतधारी और मुनियों में परम श्रेष्ठ आपका हम दर्शन कर रहे हैं ।२४। पुण्य कर्मों वाले आपके पदार्पण से आज ही यह भूमि हमारे लिए आनन्दमयी हुई है । हे सूतजी ! आप तो महान् आत्मा वाले उन श्रीव्यासजी के कृपा पात्र हैं ।२५। व्यासदेव जी के आप अनुग्रह के योग्य शिष्य हैं और सदा शिष्य में होने वाले गुण-गणों से युक्त हैं तथा परम बुद्धिमान् हैं। हे प्रभो ! आप बुद्धि से युक्त हैं और गुरुदेव के अनुग्रह के पात्र होने से आपको सम्पूर्ण तत्त्व ज्ञान है ।२६। आपने बहुत अधिक ज्ञान की प्राप्ति की है अतः आपके सभी प्रकार के संशय दूर हो गये हैं। हे प्राज्ञ ! हम लोग अब पूछ रहे हैं अतएव सभी कुछ हमारे सामने वर्णन करने के योग्य होते हैं ।२७। हम लोग सब श्रुति सम्मित परमदिव्य पुराण सम्बन्धिनी कथा का श्रवण करना चाहते हैं । आपने इस इसका श्रवण व्यासदेव जी से किया है उसी धर्मार्थ से युक्त पौराणिक कथा को हम सुनना चाहते हैं ।२८। उस समय में जब इस प्रकार के ऋषियों के द्वारा कहा गया तो विनय से संयुत और परम पण्डित सूतजी ने उत्तम विनीत उत्तर दिया था ।२६।

ऋषेः शुश्रूषणं यच्च तस्मात्प्रज्ञा च या मम । यस्माच्छुश्रूषणार्थं च तत्सत्यमिति निश्चयः ॥३० एवं गतेऽर्थे यच्छक्यं मया वक्तुं द्विजोत्तमाः । जिज्ञासा यत्र युष्माकं तदाज्ञातुमिहार्हथ ॥३१ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो मधुरं तस्य भाषितम् । प्रत्यूचुस्ते पुनः सूतं बाष्पपर्याकुलेक्षणम् ॥३२ भवान् विशेषकुशलो व्यासं साक्षात्तु दृष्टवान् । तस्मात्त्वं संभवं कृत्स्नं लोकस्येमं विदर्शय ॥३३

१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यस्य यस्याऽन्वये ये ये तांस्तानिच्छाम वेदितुम् । तेषां पूर्वविसृष्टिं च विचित्रां त्वं प्रजापते । सत्कृत्य परिपृष्टः स महात्मा रोमहर्षणः ॥३४ विस्तरेणानुपूर्व्या च कथयामास सत्तमः । सूत उवाच । यो मे द्वैपायनप्रीतः कथां वै द्विजसत्तमाः ॥३५ पुण्यामाख्यातवान्विप्रास्तां वै वक्ष्याम्यनुक्रमात् । पुराणं संप्रवक्ष्यामि यदुक्तं मातरिश्वना ॥३६

ऋषि व्यासदेव से जो भी कुछ मैंने श्रवण किया है और उस श्रवण करने से जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है जिससे भली-भाँति श्रवण कराने के लिए वह ज्ञान पूर्णतया सत्य है—ऐसा मेरा निश्चय है ।३०। हे उत्तम द्विजगणो ! इस प्रकार से ज्ञान प्राप्त होने पर जो भी कुछ मेरे द्वारा कहा जा सकता है मैं कहूँगा । जिस विषय में आपकी जो भी जानने की इच्छा है। उसको आप आज्ञा देने के योग्य हैं ।३१। मुनिगणों ने उनके इस प्रकार के मधुर भाषण को सुनकर उन्होंने प्रेमाश्रुओं से भरी हुई आँखों वाले सूतजी से फिर कहा था ।३२। आप तो विशेष रूप से निपुण हैं और आपने साक्षात् रूप से श्री व्यासजी का दर्शन किया है । इस कारण से आप इस लोक की सम्पूर्ण उत्पत्ति को विशेष रूप से दिखलाने की कृपा कीजिए ।३३। जिसके वंश में जो-जो भी हुए हैं उन-उन सबको हम जानना चाहते हैं। और आप उनके पूर्व में होने वाली प्रजापति की विचित्र विशेष सृष्टि को भी बतलाइए—यह भी हम सब जानने की इच्छा करते हैं । सत्कार करके उन महात्मा सूतजी से जब पूछा गया था ।३४। तब उन परमश्रेष्ठ महापुरुष ने आनुपूर्वी से विस्तार के साथ कहा था । श्रीसूतजी ने कहा—हे द्विजश्रेष्ठो ! परम प्रसन्न हुए द्वैपायन मुनि ने जो परम पुण्यमयी कथा मुझसे कही थी हे विप्रगणो ! उसको मैं अनुक्रम से कहूँगा । मातरिश्वा ने जो पुराण कहा है उसको मैं बतलाऊँगा ।३५-३६।

पृष्टेन मुनिभिः पूर्वैर्नैमिषीयेर्महात्मभिः । सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च ॥३७ वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् । प्रक्रिया प्रथमः पादः कथायां स्यात्परिग्रहः ॥३८

कृत्य-समुद्देश्य ] [ ११

अनुषंग उत्पोद्घात उपसंहार एव च । एवं पादास्तु चत्वारः समासात्कीर्तिता मया ॥३९ वक्ष्यामि तान्पुरस्तात्तु विस्तरेण यथाक्रमम् । प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा श्रुतम् ॥४० अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिःसृताः । अङ्गानि धर्मशास्त्रं च व्रतानि नियमास्तथा ॥४१ अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् । महदादिविशेषांतं सृजामीति विनिश्चयः ॥४२

नैमिषारण्य के निवासी महात्मा मुनियों ने पहिले पूछा था। पुराण का लक्षण ही यह है—सर्ग अर्थात् सृष्टि और प्रतिसर्ग अर्थात् उस सृष्टि से होने वाली सृष्टि, वंशों का वर्णन, मन्वन्तर अर्थात् मनुओं का कथन तात्पर्य कौन-कौन मनु किस-किस के पश्चात् हुए ।३७। वंशों में होने वालों का चरित—यह ही पाँचों बातों का होना पुराण का लक्षण है। इसमें भी चार पाद होते हैं—प्रक्रिया पहिला पाद है जो कथा में परिग्रह होता है ।३८। अनुषङ्ग, उत्पोद्घात और उपसहार इस प्रकार से संक्षेप से मैंने चार पाद बतला दिये हैं ।३९। अब पहिले उनको क्रम के अनुसार विस्तार के साथ बतलाऊँगा। सबसे प्रथम सभी शास्त्रों से पूर्व ब्रह्माजी ने पुराण का श्रवण किया था ।४०। इसके पश्चात् उनके मुख से वेद निकले थे और वेद के अङ्ग शास्त्र, धर्मशास्त्र व्रत तथा नियम आदि उनके मुख से निकले थे ।४१। जो अव्यक्त कारण है वह नित्य है और सत् तथा असत् स्वरूप वाला है। महत् आदि लेकर विशेष के अन्त तक का मैं सृजन करता हूँ-ऐसा विशेष निश्चय किया था ।४२।

अंडं हिरण्मयं चैव ब्रह्मणः सूतिरुत्तमा । अंडस्यावरणं वार्धिरपामपि च तेजसा ॥४३ वायुना तस्य वायोश्च खेन भूतादिना ततः । भूतादिर्महता चैव अव्यक्तेनावृतो महान् ॥४४ अन्तर्वर्ति च भूतानामंडमेवोपवर्णितम् । नदीनां पर्वतानां च प्रादुर्भावोऽत्र पठ्यते ॥४५

१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मन्वंतराणां सर्वेषां कल्पानां चैव वर्णनम् ।
कीर्त्तनं ब्रह्मवृक्षस्य ब्रह्मजन्म प्रकीर्त्यते ॥४६
अतः परं ब्रह्मणश्च प्रजासर्गोपवर्णनम् ।
अवस्थाश्चात्र कीर्त्यन्ते ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥४७
कल्पानां संभवश्चैव जगतः स्थापनं तथा ।
शयनं च हरेरप्सु पृथिव्युद्धरणं तथा ॥४८
सविशेषः पुरादीनां वर्णाश्रमविभाजनम् ।
ऋक्षाणां ग्रहसंस्थानां सिद्धानां च निवेशनम् ॥४९

ब्रह्माजी की सर्वोत्तम प्रसूति हिरण्मय अण्ड है। उस हिरण्मय अण्ड का आवरण सागर है, जलों का आवरण तेज के द्वारा हुआ ।४३। उस तेज का वायु से ओर वायु का आकाश से आवरण हुआ था फिर भूत आदि से हुआ था। भूत आदि का महत् से और महान् का अव्यक्त के द्वारा आवरण हुआ था ।४४। भूतों के अन्दर रहने वाला अण्ड ही उपवर्णित है। इसमें नदियों का ओर पर्वतों का प्रादुर्भाव पढ़ा जाया करता है ।४५। समस्त मन्वन्तरों का और सब कल्पों का वर्णन है। इस ब्रह्म वृक्ष का कीर्त्तन ही ब्रह्म का जन्म कीर्त्तित किया जाया करता है ।४६। इसके आगे ब्रह्माजी की प्रजाओं का उपसर्ग का उप वर्णन है। अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी की इसमें अवस्था का कीर्त्तन किया जाता है ।४७। कल्पों की उत्पत्ति-जगत की स्थापना भगवान् हरि का जलों में शयन करना तथा पृथिवी के उद्धार का वर्णन है ।४८। पुर आदि का विशेषता के साथ वर्णन, चारों वर्णों और चारों आश्रमों का विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों का संस्थान और सिद्धों के निवास स्थलों का वर्णन है ।४६।

योजनानां यथा चैव संचरो बहुविस्तरः ।
स्वर्गस्थानविभागश्च मर्त्यानां शुभचारिणाम् ॥५०
वृक्षाक्षामोषधीनां च वीरुधां च प्रकीर्त्तनम् ।
देवतानामृषीणां च द्वे सृती परिकीर्त्तिते ॥५१
आस्रादीनां तरूणां च सर्जनं व्यजनं तथा ।
पशूनां पुरुषाणी च संभवः परिकीर्त्तितः ॥५२

कृत्य-समुद्देश्य ] [ १३

तथा निर्वचनं प्रोक्तं कल्पस्य च परिग्रहः ।
नव सर्गा पुनः प्रोक्ता ब्रह्मणो बुद्धिपूर्वकाः ॥५३
त्रयो ये बुद्धिपूर्वास्तु तथा यल्लोककल्पनम् ।
ब्रह्मणोऽवयवेभ्यश्च धर्मादीनां समुद्भवः ॥५४
ये द्वादश प्रसूयंते प्रजाकल्पे पुनः पुनः ।
कल्पयोरंतरे प्रोक्तं प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ॥५५
तमोमात्रा वृतत्वात्तु ब्रह्मणोऽधर्मसंभवः ।
सत्त्वोद्रिक्ताच्च देहाच्च पुरुषस्य च संभवः ॥५६

बहुत विस्तार से योजनों के संचरण का वर्णन स्वर्ग स्थान और विभाग जो कि शुभ समाचरण करने वाले मनुष्यों का है उसका वर्णन है ।५०। फिर वृक्षों की, औषधियों की, लताओं की सृष्टि का कीर्त्तन किया गया है । देवगणों और ऋषियों की दो प्रकार की उत्पत्ति बतलायी गयी है ।५१। आम्र आदि वृक्षों की सृष्टि तथा व्यञ्जन की सृजन और पुरुषों का एवं पशुओं का सृजन बताया गया है ।५२। उसी प्रकार से निर्वचन कहा गया है और कल्प का परिग्रहण किया है । इस प्रकार से ब्रह्मा के बुद्धि के साथ नौ सर्ग कहे गये हैं ।५३। जो ये तीन हैं वे बुद्धि से युक्त हैं और जो लोकों की कल्पना है ब्रह्मा के अवयवों से धर्म आदि की उत्पत्ति होती हैं ।५४। प्रजा के कल्प में जो द्वादश प्रसूत हुआ करते हैं और बार-बार उत्पन्न होते हैं जो उन दोनों की प्राप्ति सन्धि है वह कल्पों के अन्तर में कही गयी है ।५५। तमोगुण की मात्रा से समावृत होने से ब्रह्मा से अधर्म की उत्पत्ति हुआ करती है और सत्त्व के उद्रेक वाले देह से पुरुष की उत्पत्ति होती है ।५६।

तथैव शतरूपायां तयोः पुत्रास्ततः परम् ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतयः शुभाः ॥५७
कीर्त्यंते धूतपाप्मानस्त्रैलोक्ये ये प्रतिष्ठिताः ।
रुचेः प्रजापतेश्चोर्ध्व माकृत्यां मिथुनोद्भवः ॥५८
प्रसूत्यामपि दक्षस्य कन्यानामुद्भवः शुभः ।
दाक्षायणीषु वाप्यूर्ध्वं शब्दाद्यासु महात्मनः ॥५९

१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

धर्मस्य कीर्त्यते सर्गः सात्त्विकस्तु सुखोदयः । तथाऽधर्मस्य हिंसायां तामसोऽशुभलक्षणः ॥६० भृग्वादीनामृषीणां च प्रजासर्गोपवर्णनम् । ब्रह्मर्षेश्च वसिष्ठस्य यत्र गोत्रानुकीर्त्तनम् ॥६१ अग्नेः प्रजायाः संभूतिः स्वाहायां यत्र कीर्त्यते । पितृ णां द्विपकाराणां स्वधायां तदनन्तरम् ॥६२ पितृवंशप्रसंगेन कीर्त्यते च महेश्वरात् । दक्षस्य शापः सत्यांश्च भृग्वादीनां च धीमताम् ॥६३

उसी प्रकार से ही शतरूपा में उन दोनों के पुत्र समुत्पन्न हुए थे । इसके आगे प्रियव्रत और उत्तानपाद हुए थे । प्रसूति की परम शुभ आकृतियां थीं ।५७। त्रिभुवन में जो प्रतिष्ठा से युक्त थे वे पापों से रहित थे—ऐसा ही कहा जाता है । प्रजापति से रुचि की और फिर आकूति में मिथुन से उत्पत्ति हुई थी ।५८। प्रजापति दक्ष की कन्याओं का प्रसूति में जन्म परम शुभ हुआ शब्दाद्य दाक्षायणीओं में भी महान् आत्मा वाले धर्म का उद्भव हुआ था ।५६। यह धर्म का जन्म परम सात्विक और सुख के उदय वाला सर्ग कहा जाता है । उसी भाँति हिंसा में अधर्म का उद्भव हुआ है जो तामस और अशुभ लक्षण वाला है ।६०। भृगु आदि ऋषियों की प्रजा के सर्ग का उप वर्णन है और जिसमें ब्रह्मर्षि वसिष्ठजी के गोत्र का अनुकीर्त्तन किया है ।६१। जिसमें स्वाहा नाम धारिणी स्वाहा पत्नी में अग्नि की सन्तति का वर्णन किया जाता है । इसके उपरान्त स्वधा नाम की पत्नी में दो प्रकार के पितृगणों का वर्णन किया जाता है ।६२। पितृगणों के वंश के प्रसङ्ग से भगवान् महेश्वर से और सती से दक्ष प्रजापति के लिए शाप का वर्णन है और परम बुद्धिमान भृगु आदि ऋषियों को जो प्रतिशाप दिया गया है उसका वर्णन होता है ।६३।

प्रतिशापश्च दक्षस्य रुद्रादद्भुतकर्मणः । प्रतिषेधश्च वैरस्य कीर्त्यते दोषदर्शनात् ॥६४ मन्वन्तरप्रसंगेन कालाख्यानं च कीर्त्यते । प्रजापतेः कर्द्दमस्य कन्यायाः शुभलक्षणम् ॥५६

कृत्य-समुद्देश्य ] [ १५

प्रियव्रतस्य पुत्राणां कीर्त्यते यत्र विस्तरः । तेषां नियोगो द्वीपेषु देशेषु च पृथक् पृथक् ॥६६ स्वायंभुवस्य सर्गस्य ततश्चाप्यनुकीर्त्तनम् । वर्षाणां च नदीनां च तद्भेदानां च सर्वशः ॥६७ द्वीपभेदसहस्राणामन्तर्भावश्च सप्तसु । विस्तरान्मण्डलं चैव जंबूद्वीपसमुद्रयोः ॥६८ प्रमाणं योजनाग्रेण कीर्त्यते पर्वतैः सह । हिमवान्हेमकूटश्च निषधो मेरुरेव च । नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च कीर्त्यन्ते सप्त पर्वताः ॥६९ तेषामन्तरविष्कंभा उच्छ्रायायामविस्तराः ॥७०

अद्भुत कर्मों वाले भगवान् रुद्र से दक्ष के प्रतिशाप का कथन है और दोष के दर्शन से वैर के प्रतिषेध का कीर्त्तन किया जाता है ।६४। मन्वन्तर के प्रसङ्ग से काल का भी आख्यान कहा जाता है प्रजापति कर्दम की कन्या का शुभ लक्षण बताया जाता है ।६५। जहाँ पर प्रियव्रत राजा के पुत्रों का विस्तार कीर्त्तित किया जाता है और द्वीपों में तथा देशों में पृथक्-पृथक् उनके नियोग का वर्णन है ।६६। इसके अनन्तर स्वायम्भुव मनु के सर्ग का वर्णन किया जाता है और सब वर्षों का नदियों का और समस्त उनके भेदों का अनुकीर्त्तन किया जाता है ।६७। फिर सहस्रों द्वीपों के भेदों का सात द्वीपों में ही अन्तर्भाव का वर्णन तथा जम्बू द्वीप और समुद्र के मण्डल का विस्तार से वर्णन किया जाता है ।६८। योजनों के अग्रभाग से पर्वतों के साथ प्रमाण का कीर्त्तन किया जाता है । इसके अनन्तर हिमवान्-हेमकूट-निषध-मेरु-नील श्वेत और शृङ्ग-इन सात पर्वतों का वर्णन किया जाता है ।६९। उनके अन्तर विष्कम्भ, उच्छ्राय, आयाम और विस्तार का वर्णन किया जाता है ।७०।

कीर्त्यन्ते योजनाग्रेण ये च तत्र निवासिनः । भारतादीनि वर्षाणि नदीभिः पर्वतैस्तथा ॥७१ भूतैश्चोपनिविष्टानि गतिमद्भिर्ध्रुवैस्तथा । जम्बूद्वीपादयो द्वीपाः समुद्रैः सप्तभिर्वृताः ॥७२

१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ततः स्वर्णमयी भूमिलोंकालोकश्च कीर्त्यते ।
सप्रमाणा इमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥७३
रूपादयः प्रकीर्त्यन्ते करणात्प्राकृतैः सह ।
सर्वे चैतत्प्रधानस्य परिणामैकदेशिकम् ॥७४
पर्यायपरिमाणं च संक्षेपेणात्र कीर्त्यते ।
सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पृथिव्याश्चाप्यशेषतः ॥७५
प्रमाणं योजनाग्रेण सांप्रतैरभिमानिभिः ।
महेन्द्राद्याः शुभाः पुण्या मानसोत्तरमूर्धनि ॥७६
अत ऊर्ध्वगतिश्चोक्ता सूर्यस्यालातचक्रवत् ।
नागवीथ्यक्षवीथ्योश्च लक्षणं च प्रकीर्त्यते ॥७७

योजनों की अग्रता से वहाँ पर उन पर्वतों में जो निवास किया करते हैं उनका भी वर्णन किया जाता है और भारत आदि वर्षों का नदियों के और पर्वतों के साथ वर्णन किया जाता है ।७१। जो कि भूतों से और मतिमान् ध्रुवों के साथ वहाँ पर उपनिविष्ट हैं उनका कीर्त्तन किया जाता है। जम्बू द्वीप आदि द्वीप सात समुद्रों के द्वारा घिरे हुए हैं ।७२। वहाँ पर स्वर्ण से परिपूर्ण है और वहाँ पर लोकालोक नाम वाला पर्वत है—यह बताया जाता है । ये सब लोक प्रमाणों से युक्त हैं और सप्तद्वीप तथा पृथिवी हैं—इनका भी प्रमाण बताया जाता है ।७३। करण से प्राकृतों के साथ-साथ प्रादिक का कीर्त्तन किया जाता है । यह सभी कुछ प्रधान के परिमाण का एक देशिक है अर्थात् यह सब प्रकृति के परिणाम के कारण ही होता है ।७४। इनका पर्याय-परिणाम यहाँ पर बहुत ही संक्षेप के साथ कीर्तित किया जाता है। सूर्य और चन्द्र का तथा पृथिवी का पूर्ण परिणाम बताया जाता है ।७५। इस समय में होने वाले उनके अभिमानी अर्थात् स्वामियों का प्रमाण योजनों के हिसाब से कहा जाता है । मानस के उत्तर में ऊपर परम शुभ और पुण्यमय महेन्द्र आदि हैं—उनका वर्णन है । इसके ऊपर अलात (मशाल) के चक्र की भाँति सूर्य की गति बतायी गयी है । और नागवीथी तथा अक्षवीथी का लक्षण बताया जाता है ।७६-७७।

कोष्ठयोर्लेखयोश्चैव मण्डलानां च योजनैः ।
लोकालोकस्य सन्ध्याया अह्नो विषुवतस्तथा ॥७८

कृत्य-समुद्देश्य ] [ १७

लोकपालाः स्थिताश्चोर्ध्वं कीर्त्यन्ते ते चतुर्दिशम् ।
पितॄणां देवतानां च पन्थानौ दक्षिणोत्तरौ ॥७९
गृहिणां न्यासिनां चोक्तो रजः सत्त्वसमाश्रयः ।
कीर्त्यते च पदं विष्णोर्धर्माद्या यत्र च स्थिताः ॥८०
सूर्यचन्द्रमसोश्चारो ग्रहाणां ज्योतिषां तथा ।
कीर्त्यते धृतसामर्थ्यात्प्रजानां च शुभाऽशुभम् ॥८१
ब्रह्मणा निर्मितः सौरः सादनार्थं च स स्वयम् ।
कीर्त्यते भगवान्येन प्रसर्प्पति दिवः क्षयम् ॥८२
स रथाऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्ऋषिभिस्तथा ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ॥८३
अपां सारमयात्स्यन्दात्कथ्यते च रसस्तथा ।
वृद्धिक्षयौ च सोमस्य कीर्त्येते सोमकारितौ ॥८४

मण्डलों के योजनों के हिसाब से कोष्ठों और लेखों का वर्णन है। लोकालोक की सङ्ख्या का, दिन का तथा विषुवत् का वर्णन किया जाता है ।७८। ऊपर की ओर लोकपाल स्थित रहा करते हैं और उनका कीर्त्तन चारों दिशाओं में किया जाता है। पितृगणों और देवगणों के मार्ग क्रम से दक्षिण और उत्तर में बताये गये हैं ।७९। गृहस्थियों और संन्यासियों का मार्ग रजोगुण और सत्वगुण के समाश्रय वाला कहा गया है और भगवान् विष्णु का स्थान बताया गया है जहां पर धर्म आदि स्थित रहा करते हैं ।८०। सूर्य-चन्द्रमा, ज्योतिर्गण और ग्रहों का सञ्चरण कीर्त्तित किया जाता है जो कि सामर्थ्य के धारण करने से प्रजाजनों के लिए शुभ औद अशुभ हुआ करते हैं। तात्पर्य यह है कि कुछ शुभ ग्रहों की चाल मानवों को शुभ होती है और कुछ पाप ग्रहों के चाल बुरी हुआ करती है ।८१। ब्रह्माजी ने स्वयं ही सौर की रचना सदना करने के लिए की है—ऐसा कीर्त्तित किया जाता है। जिससे भगवान् भुवन भास्कर दिन के अन्त में क्षय को प्राप्त होते हैं ।८२। वह भगवान् सूर्यदेव रथ पर अधिष्ठित हैं और वे देव-असुर-ऋषि-गण-गन्धर्व-अप्सरा गण-ग्रामवासी-सूर्य और राक्षसों के द्वारा जली के सार को प्राप्त करता है और स्यन्द होने से वह रस कहा जाया करता है। चन्द्र द्वारा किये गये सोम के वृद्धि तथा क्षय कहे जाते हैं ।८३-८४।

१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सूर्यादीनां स्यन्दनानां ध्रुवादेव प्रवर्त्तनम् । कीर्त्यते शिशुमारस्य यस्य पुच्छे ध्रुवः स्थितः ॥८५ तारारूपाणि सर्वाणि नक्षत्राणि ग्रहैः सह । निवासा यत्र कीर्त्यन्ते देवानां पुण्यकर्मणाम् ॥८६ सूर्यरश्मिसहस्रं च वर्षशीतोष्णविश्रवः । प्रविभागश्च रश्मीनां नामतः कर्मतीर्थतः ॥८७ परिमाणं गतिश्चोक्ता ग्रहाणां सूर्यसंश्रयात् । वैश्यारूपात्प्रधानस्य परिमाणो महद्भवः ॥८८ पुरूरवस ऐलस्य माहात्म्यस्यानुकीर्त्तनम् । पितॄणां द्विप्रकाराणां माहात्म्यं वामृतस्य च ॥८९ ततः पर्वाणि कीर्त्यन्ते पर्वणां चैव संधयः । स्वर्गलोकगतानाञ्च प्राप्तानाञ्चाप्यधोगतिम् ॥९० पितॄणां द्विप्रकाराणां श्राद्धेनानुग्रहो महान् । युगसंख्याप्रमाणं च कीर्त्यते च कृतं युगम् ॥९१ त्रेतायुगे चापकर्षाद्वार्त्तायाः संप्रवर्त्तनम् । वर्णानामाश्रमाणां च संस्थितिर्धर्मतस्तथा ॥९२

सूर्यादि स्यन्दनों ध्रुव से ही प्रवर्त्तन होता है जिस शिशुमार के पुच्छ में स्थित ध्रुव कीर्त्तित किया जाता है ।८५। ताराओं के रूप वाले समस्त नक्षत्र ग्रहों के साथ रहते हैं जहाँ पर पुण्य कर्मों वाले देवों के निवास बतलाये जाया करते हैं ।८६। सूर्य की सहस्र किरणें, वर्षा, शीत, गर्मी का विस्रवण और रश्मियों का विभाग नाम से और कर्म तीर्थ से हैं ।८७। भगवान् सूर्यदेव के संश्रम से ग्रहों की गति और परिणाम कहे गये हैं । वैश्या रूप से प्रधान का परिमाण महद्भव है ।८८। पुरुरवा और ऐल के माहात्म्य का अनुकीर्त्तन है ।८९। इसके अनन्तर पर्व तथा पर्वों की सन्धियां कही जाती हैं । जो प्राणी स्वर्गलोक में प्राप्त होते हैं और जो अधोगति अर्थात् नरकगामी हैं उनका वर्णन है । दोनों प्रकार के पितृगणों का श्राद्ध करने से बड़ा भारी अनुग्रह होता है । सभी युगों की जितने समय की आयु है उसका

कृत्य-समुद्देश्य ] [ १६

प्रमाण बताया गया है तथा कृतयुग (सत्ययुग) का वर्णन किया है ।६०-६१। और त्रेतायुग में अपकर्ष से वार्ता की सम्प्रवृत्ति होती है । उसी भांति धर्म से चारों वर्णों की और चारों आश्रमों की संस्थिति होती है ।६२।

वज्रप्रवर्त्तनं चैव संवादा यत्र कीर्त्यते । ऋषीणां वसुना सार्द्धं वसोश्चाधः पुनर्गतिः । शब्दत्वं च प्रधानात्तु स्वायम्भुवमृते मनुम् ॥६३ प्रशंसा तपसश्चोक्ता युगावस्थाश्च कृत्स्नशः । द्वापरस्य कलेश्चापि संक्षेपेण प्रकीर्त्तनम् ॥६४ मन्वन्तरं च संख्या च मानुषेण प्रकीर्त्तिता । मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव च लक्षणम् ॥६५ अतीतानागतानां च वर्त्तमानं च कीर्त्यते । तथा मन्वन्तराणां च प्रतिसंधानलक्षणम् ॥६६ अतीतानागतानां च प्रोक्तं स्वायम्भुवे ततः । ऋषीणां च गतिः प्रोक्ता कालज्ञानगतिस्तथा ॥६७ दुर्गसंख्याप्रमाणं च युगवार्ताप्रवर्त्तनम् । त्रेतायां चक्रवर्त्तीनां लक्षणं जन्म चैव हि ॥६८

और वज्र का प्रवर्त्तन है जहाँ पर सम्वाद कीर्त्तित किया जाता है । ऋषियों का वसु के साथ फिर वसु की अधोगति कही गयी है । और शब्दत्व स्वायम्भुव मनु के विना प्रधान से है ।६३। और तपश्चर्या की प्रशंसा कही गयी है तथा पूर्णतया युगों की अवस्था बतायी है । द्वापर और कलियुग का संक्षेप से कीर्त्तन किया गया है ।६४। मन्वन्तर और संख्या मानुष से कीर्त्तित की गयी है । समस्त मन्वन्तरों का यही लक्षण है ।६५। जो भूत काल में हो चुके हैं और जो भविष्य में होने वाले हैं तथा वर्त्तमान काल का कीर्त्तन किया जाता है । उसी भाँति मन्वन्तरों के प्रति सन्धान का लक्षण है ।६६। बीते हुए और आगतों के स्वायम्भुव के कहने पर फिर ऋषियों की गति कही गयी है तथा काल के ज्ञान की गति बतायी गयी है । दुर्गों की संख्या और प्रमाण तथा युग वार्ता का प्रवर्त्तन है । त्रेतायुग में जो चक्रवर्ती राजा हुए थे उनका लक्षण और जन्म कहा गया है ।६७-६८।

२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रमतेश्च तथा जन्म अथो कलियुगस्य वै । अंगुलैर्ह्लासिमं चैव भूतानां यच्च चोच्यते ॥९९ शाखानां परिसंख्यान शिष्यप्राधान्यमेव च । वाक्यं सप्तविधं चैव ऋषिगोत्रानुकीर्तनम् ॥१०० लक्षणं सूतपुत्राणां ब्राह्मणस्य च कृत्स्नशः । वेदानां व्यसनं चैव वेदव्यासैर्महात्मभिः ॥१०१ मन्वन्तरेषु देवानां प्रजेशनां च कीर्त्तनम् । मन्वन्तरक्रमश्चैव कालज्ञानं च कीर्त्यते ॥१०२ दक्षस्य चापि दौहित्राः प्रियाया दुहितुः शुभाः । ब्रह्मादिभिस्ते जनिता दक्षेणैव च धीमता ॥१०३ सावर्णाश्चाव कीर्त्यन्ते मनवो मेरुमाश्रिताः । ध्रुवस्योत्तानपादस्य प्रजासर्गोपवर्णनम् ॥१०४ चाक्षुषस्य मनो सर्गः प्रजानां वीर्यवर्णनम् । प्रथुणा चैव वैन्येन भूमिदोहप्रवर्त्तता ॥१०५

प्रमति के जन्म का कीर्त्तन और इसके अनन्तर कलियुग के जन्म का वर्णन है । जो व्यतीत हो चुके हैं उनका अँगुली से ह्रास का होना कहा जाता है ।९९। शाखाओं की परिसंख्यों और शिष्यों की प्रधानता कही गयी है । सात प्रकार के वाक्य और ऋषियों के गोत्र का कथन है ।१००। सूत पुत्रों का लक्षण और ब्राह्मण का पूर्ण लक्षण है । महान् आत्मा वाले वेद-व्यासों के द्वारा वेदों का व्यसन बताया गया है ।१०१। मन्वन्तरों में क्षेत्रों का और प्रजापतियों का कीर्त्तन किया गया है । मन्वन्तर का क्रम और काल के ज्ञान का वर्णन किया है ।१०२। दक्ष-प्रजापति की प्यारी बेटी के परम शुभ दौहित्र (धेवते) वर्णित किये गये हैं । धीमान् दक्ष के ही द्वारा ब्रह्मादि से वे उत्पन्न किये थे ।१०३। यहाँ पर मेरु गिरि पर आश्रय लेने वाले सावर्ण मनुओं का कीर्त्तन किया जाता है । उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव की प्रजाओ के उपसर्ग का वर्णन है । चाक्षुष मनु के सर्ग का कथन है और प्रजाओं के वीर्य—पराक्रम का कथन है । प्रभु वैन्य के द्वारा जो भूमि के दोहन करने के लिए प्रवृत्ति हुई थी उसका वर्णन है ।१०४-१०५।

कृत्य-समुद्देश्य ] [ २१

पात्राणां पयसां चैव वत्सानां च विशेषणम् । ब्रह्मादिभिः पूर्वमेव दुग्धा चेयं वसुन्धरा ॥१०६ दशभ्यश्च प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतेः । दक्षस्य कीर्त्यते जन्म समस्यांशेन धीमतः ॥१०७ भूतभव्यभवैशत्वं महेंद्राणां च कीर्त्यते । मन्वादिका भविष्यन्ति आख्यानैर्बहुभिर्वृताः ॥१०८ वैवस्वतस्य च मनोः कीर्त्यते सर्गविस्तरः । ब्रह्मादिकोश उत्पत्तिर्भृग्वादीनां च कीर्त्यते ॥१०९ विनिष्कृष्य प्रजासर्गं चाक्षुषस्य मनोः शुभे । दक्षस्य कीर्त्यते सर्गो ध्यानाद्वैवस्वतांतरे ॥११० नारदः कृतसंवादो दक्षपुत्रान्महाबलान् । नाशयामास शापाय मानसो ब्रह्मणः सुतः ॥१११ ततो दक्षोऽसृजत्कन्यां वैरिणा नाम विश्रुताः । मरुत्प्रवाहे मरुतो दित्यां देव्यां च संभवः ॥११२

पात्रों का, दुग्धों का और वत्सों का विशेषण बताया गया है । पूर्व में ही ब्रह्मा आदि के द्वारा इस वसुन्धरा का दोहन किया गया था ।१०६। दश प्रचेताओं से मारिषा में अंश से समान धीमान् दक्ष के जन्म का कीर्त्तन किया जाता है ।१०७। महेन्द्रों के भूतभव्य और शवेशत्व का कीर्त्तन किया जाता है । बहुत से आख्यानों से युक्त मन्वादिक होंगे ।१०८। वैवस्वत मनु के सर्ग का विस्तार कहा जाता है और ब्रह्मादि कोश और भृगु आदि की उत्पत्ति का वर्णन किया जाता है ।१०९। विनिष्कर्षक करके चाक्षुप मनु के शुभ प्रजा के सर्ग में वैवस्वत के अन्तर में ध्यान से दक्ष के सर्ग का वर्णन किया जाता है ।११०। ब्रह्माजी के मानस अर्थात् मन से समुत्पन्न पुत्र श्री नारद जी ने सम्वाद करके महान् बलवान् दक्ष के पुत्रों को शाप के लिए विनाश युक्त कर दिया था ।१११। इसके अनन्तर प्रजापति दक्ष ने कन्याओं को समुत्पन्न किया था जो कि वैरी के द्वारा नाम विश्रुत हुए थे । मरुत् के प्रवाह में मरुत देवी दिति में समुत्पन्न हुआ था ।११२।

कीर्त्यन्ते मरुतां चात्र गणास्ते सप्त सप्तकाः ।

२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देवत्वमिन्द्रवासेन वायुस्कन्धेषु चाश्रमः ॥११३ दैत्यानां दानवानां च यक्षगंधर्वरक्षसाम् । सर्वभूतपिशाचानां यक्षाणां पक्षिवीरुधाम् ॥११४ उत्पत्ततश्चाप्सरसां कीर्त्यते बहुविस्तरात् । मार्तण्डमण्डलं कृत्स्नं जन्मैरावतहस्तिनः ॥११५ वैनतेयसमुत्पत्तिस्तथा राज्याभिषेचनम् । भृगूणां विस्तरश्चोक्तस्तथा चांगिरसामपि ॥११६ कश्यपस्व पुलस्त्यस्य तथैवात्रेर्महात्मनः । पराशरस्य च मुनेः प्रजानां यत्र विस्तरः ॥११७ तिस्रः कन्याः सुकीर्त्यन्ते यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । इच्छाया विस्तरश्चोक्त आदित्यस्य ततः परम् ॥११८ किकुविच्चरितं प्रोक्तं ध्रुवस्यैव निवर्हणम् । वृहद्वलानां संक्षेपादिक्ष्वाक्वाद्याः प्रकीर्त्तितः ॥११९॥

इसमें मरुतों के गणों के सात सप्तक अर्थात् उनचास कीर्त्तित किये जाते हैं। इनको इन्द्र के वास होने से देवत्व है तथा वायु के स्कन्धों में आश्रम है ।११३। दैत्यों की—दानवों की और यक्ष—गन्धर्व तथा राक्षसों की—सब भूत और पिशाचों की—यक्षों की—पक्षियों की और वीरुधों की उत्पत्तियाँ हुई थीं ।११४। इन सबकी उत्पत्तियों का और अप्सराओं की उत्पत्ति का बहुत विस्तृत कीर्त्तन किया जाता है। सम्पूर्ण मार्तण्ड मण्डल का और ऐरावत हस्ती का जन्म बताया गया है ।११५। वैनतेय की उत्पत्ति और राज्य पर अभिषेक का वर्णन है। भृगुओं का और अङ्गिराओं का विस्तार कहा गया है ।११६। जहाँ पर कश्यप—पुलस्त्य और महात्मा अत्रि का तथा पराशर मुनि की प्रजाओं का विस्तार बताया गया है ।११७। तीन कन्याऐं बतायी जाती हैं जिनमें सबलोक प्रतिष्ठित हैं। इच्छा का विस्तार कहा गया है और इसके बाद आदित्य का विस्तृत वर्णन है ।११८। किकुवित् का चरित कहा गया है। ध्रुव का निवर्हण है। वृहद्बलों का वर्णन है और संक्षेप से इक्ष्वाकु आदि कहे गये हैं ।११९।

निश्यादीनां क्षितीशानां पलांडुहरणादिभिः । कीर्त्यते विस्तरात्सर्गो ययातेरपि भूपतेः ॥१२०॥

कृत्य-समुद्देश्य ] [ २३

यदुवंशसमुद्देशो हैहयस्य च विस्तरः । क्रोधादनन्तरं चोक्तस्तथा वंशस्य विस्तरः ॥१२१ ज्यामघस्य च माहात्म्यं प्रजासर्गश्च कीर्त्यते । देवावृधस्यांधकस्य धृष्टेश्चापि महात्मनः ॥१२२ अनिमित्रान्वययश्चैव विशोर्मिथ्याभिशंसनम् । विशोधमनुसंप्राप्तिर्मणिरत्नस्य धीमतः ॥१२३ सत्राजितः प्रजासर्गे राजर्षेर्देवमीढुषः । शूरस्य जन्म चाप्युक्तं चरितं च महात्मनः ॥१२४ कंसस्यापि च दौरात्म्यमेकीवंश्यात्समुद्भवः । वासुदेवस्य देवक्यां विष्णोरमिततेजसः ॥१२५ अनन्तरमृषेः सर्गप्रजासर्गोपवर्णनम् । देवासुरे समुत्पन्ने विष्णुना स्त्रीवधे कृते ॥१२६ संरक्षता शक्रवधं शापः प्राप्तः पुरा भृगोः । भृगुश्चोत्थापयामास दिव्यां शुक्रस्य मातरम् ॥१२७

निष्पादिक नृपों का पलाण्डु हरण आदि के द्वारा भूपति ययाति का भी सर्ग विस्तार पूर्वक कहा गया है ।१२०। राजा यदु के वंश का समुद्देश और हैहय का विस्तार बताया गया है । क्रोध के अनन्तर वंश का विस्तार कहा गया है ।१२१। ज्यामघ का माहात्म्य और उसकी प्रजाओं की उत्पत्ति कीर्त्तित की जाती है । देवा वृध—अन्धक और महान आत्मा वाले धृष्टि का वर्णन किया जाता है ।१२२। अनमित्र का वंश-वर्णन, तथा विश्रु का मिथ्या अभिशंसन और धीमान् मणिरत्न का विरोध तथा अनुसम्प्राप्ति बतायी गयी है ।१२३। राजर्षि देवमीढु के प्रजा के सर्ग में सत्राजित् और शूर का भी जन्म कहा है तथा इस महात्मा का चरित भी बताया गया है ।१२४। राजा कंस की दुरात्मता और एकीवंशत्व से समुत्पत्ति बतायी गयी है । वसुदेव का जन्म और देवकी के गर्भ से अपरिमित तेज वाले भगवान् विष्णु का आविर्भाव हुआ था ।१२५। इसके पश्चात् ऋषि का सर्ग है और प्रजाओं के सर्ग का उपवर्णन है । देवासुर के समुत्पन्न होने पर विष्णु भगवान् के द्वारा स्त्री का वध किये जाने पर ।१२६। इन्द्र के वध का संरक्षण करने वाले ने पहिले

२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भृगु का शाप प्राप्त किया था और भृगु ने शुक्र की दिव्य माता को उठाया था ॥१२७॥

देवानां च ऋषीणां च संक्रमा द्वादशाहृताः । नारसिंहप्रभृतयः कीर्त्यन्ते पापनाशनाः ॥१२८ शुक्रेणाराधनं स्थाणोर्घोरेण तपसा तथा । वरप्रदानकृत्तं न यत्र शर्वंस्तज्वः कृतः ॥१२६ अनन्तरं च निर्दिष्टं देवासुरविचेष्टितम् । जयंत्या सह शक्रेण यत्र शुक्रो महात्ममति ॥१३० असुरान्मोहयामास शक्ररूपेण बुद्धिमान् । वृहस्पति तं शुक्रं शशाप स महाद्युतिः ॥१३१ उक्तं च विष्णोर्माहात्म्यं विष्णोर्जन्मनि शब्द्यते । तुर्वसुश्चात्र दौहित्रो यवीयान्यो यदोरभूत् ॥१३२ अनुद्रुह्यादयः सर्वे तथा तन्तनया नृपाः । अनुवंश्या महात्मानस्तेषां पार्थिवसत्तमाः ॥१३३

देवों के और ऋषियों के संक्रम से द्वादश आहूत हुए थे । नारसिंह प्रभृति पापों के नाश करने वाले कीर्तित किये गये हैं ।१२८। अत्यन्त घोर तप के द्वारा शुक्र देव ने भगवान् शिव की आराधना की थी । फिर उसने वर के प्रदान करने वाले भगवान् शिव की स्तुति की थी ।१२९। इसके उपरान्त देवों और असुरों की विशेष चेष्टा का निर्देश किया गया है जहाँ पर महात्मा में शुक्र ने जयन्ती के साथ इन्द्र ने किया था ।१३०। बुद्धिमान् ने इन्द्र के रूप से असुरों को मोहित कर दिया था । और महती द्युति वाले वृहस्पति ने शुक्राचार्य को शाप दे दिया था ।१३१। भगवान् विष्णु के जन्म में विष्णु का माहात्म्य कहा जाता है । वहाँ पर तुर्वसु दौहित्र था जो यदु का सब से छोटा हुआ था ।१३२। अनुद्रुह्य आदि सब नृप उसके पुत्र हुए थे । उसके महात्मा श्रेष्ठ नृप उनके पीछे वंश में होने वाले हुए थे ।१३३।

कीर्त्यन्ते यत्र कात्स्न्र्येन भूरिद्रविणतेजसः । आतिथ्यस्य तु विप्रर्षेः सप्तधा धर्मसंश्रयात् ॥१३४ बार्हस्पत्यं सूरिभिश्च यत्र शापमुपावृतम् ।

कृत्य-समुद्देश्य ] [ २५

हरवंशयशः स्पर्शः शांतनोर्वीर्य्यशब्दनम् ॥१३५ भविष्यतां तथा राज्ञामुपसंहारशब्दनम् । अनागतानां संघानां प्रभूणां चोपवर्णनम् ॥१३६ भौत्यस्यांते कलियुगे क्षीणे संहारवर्णनम् । नैमित्तिकाः प्राकृतिका यथैवात्यंतिकाः स्मृताः ॥१३७ विविधः सर्वभूतानां कीर्त्यते प्रतिसंचरः । अनावृष्टिर्भास्करस्य घोरः संवर्त्तकानलः ॥१३८ सांख्ये लक्षणमुद्दिष्टं ततो ब्रह्म विशेषतः । ध्रुवादीनां च लोकानां सप्तानां चोपवर्णनम् ॥१३९ अपारार्द्धापरैश्चैव लक्षणं परिकीर्त्यते । ब्रह्माणो योजनाग्रेण परिमाणविनिर्णयः ॥१४० कीर्त्यन्ते चात्र निरयाः पापानां रौरवादयः । सर्वेषां चैव सत्त्वानां परिणामविनिर्णयः ॥१४१

जहाँ पर पूर्णरूप से अधिक द्रव्य और तेज वाले विप्रर्षि के धर्म के संश्रय से आतिथ्य का कीर्त्तन किया जाता है ।१३४। जहाँ पर सूरियों ने वृहस्पति के शाप को प्राप्त किया था। हर वंश के यश का स्पर्श है और राजा शन्तनु के वीर्य पराक्रम का कथन है ।१३५। आगे भविष्य में होने वाले राजाओं के उपसंहार का कथन है। जो अनागत संघ हैं और प्रभु हैं उनका उपवर्णन है ।१३६। भोत्य के अन्त में कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार का वर्णन है। जो भी किसी निमित्त के कारण होने वाले थे, प्राकृतिक थे और जो आत्यन्तिक कहे गये हैं ।१३७। समस्त प्राणियों का अनेक प्रकार का प्रति सञ्चरण था उसका कीर्त्तन किया जाता है। भगवान् भास्कर का दृष्टि में न आने वाला परम घोर संवर्त्तक अनल था ।१३८। सांख्य में लक्षण उद्दिष्ट है इसके बाद विशेष रूप से ब्रह्म का वर्णन है। ध्रुव आदि सात लोकों का उप वर्णन है ।१३९। अपराद्धं परों के द्वारा लक्षण का परिकीर्त्तन किया जाता है। योजनाग्र से ब्रह्म के परिमाण का विशेष निर्णय किया गया है ।१४०। रौरव आदि नरकों का तथा सभी प्राणियों के पापों के निर्णय का वर्णन किया गया है ।१४१।

२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ब्रह्मणः प्रतिसंसर्गात्सर्वसंसारवर्णनम्।
गतिरूर्ध्वमधश्चोक्ता धर्माधर्मसमाश्रया ॥१४२
कल्पे कल्पे च भूतानां महतामपि संक्षयम्।
असंख्यया च दुःखानि ब्रह्मणश्चाप्यनित्यता ॥१४३
दौरात्म्यं चैव भोगानां संहारस्य च कष्टता।
दुर्लभत्वं च मोक्षस्य वैराग्याद्दोषदर्शनात् ॥१४४
व्यक्ताव्यक्तं परित्यज्य सत्त्वं ब्रह्मणि संस्थितम्।
नानात्वदर्शनाच्छुद्धस्तवस्तत्र निवर्त्तते ॥१४५
ततस्तापत्रयाद् भीतो रूपार्थो हि निरंजनः।
आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य न विभेति कुश्चन ॥१४६
कीर्त्यते च पुनः सर्गो ब्रह्मणोऽन्यस्य पूर्ववत्।
कीर्त्यते जगतश्चात्र सर्गप्रलयविक्रियाः ॥१४७

ब्रह्मा के प्रति संसर्ग से सब संसार का वर्णन होता है। धर्म और अधर्म के समाश्रय वाली ऊर्ध्वगति और अधोगति कही गयी है ।१४२। कल्प कल्प में महान् भूतों का भी संक्षय होता है और असंख्य दुःख होते हैं तथा ब्रह्मा की भी नित्यता नहीं है अर्थात् ब्रह्मा का भी विनाश होता है ।१४३। भोगों की दुरात्मता है अर्थात् भोगी का बुरा प्रभाव होता है और संहार के समय में बड़ा कष्ट होता है। दोषों के देखने से जो वैराग्य उत्पन्न होता है वह बहुत कठिन है और मोक्ष होना महान दुर्लभ है ।१४४। व्यक्त और अव्यक्त का पूर्ण सत्व ब्रह्म में संस्थित हो जाता है। नाना रूपता के दर्शन से वहाँ पर शुद्ध स्तव निवृत्त हो जाया करता है ।१४५। इसके अनन्तर तीनों (आधिभौतिक-आधिदैविक आध्यात्मिक) तापों से भयभीत होता हुआ रूपार्थ निरञ्जन ब्रह्म के आनन्द को प्राप्त करके फिर कही से भी नहीं डरता है ।१४६। फिर पूर्व की ही भाँति अन्य ब्रह्मा के सर्ग का कीर्त्तन किया जाता है। इसमें जगत की सृष्टि-प्रलय और विक्रिया का कीर्त्तन किया जाता है ।१४७।

प्रवृत्तयश्च भूतानां प्रसूतानां फलानि च।
कीर्त्यते ऋषिवर्गस्य सर्गः पापप्रणाशनः ॥१४८

२७ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रादुर्भावो वसिष्ठस्य शक्तोर्जन्म तथैव च । सौदासास्थिग्रहश्चास्य विश्वामित्रकृतेन तु ॥१४९ पराशरस्य चोत्पत्तिरदृश्यन्त्यां तथा विभोः । संजज्ञे पितृकन्यायां व्यासश्चापि महामुनिः ॥१५० शुकस्य च तथा जन्म सह पुत्रस्य धीमतः । पराशरस्य प्रद्वेषो विश्वामित्रऋषि प्रति ॥१५१ वसिष्ठसंभृतिश्चाग्नेर्विश्वामित्रजिघांसया । देवेन विधिना विप्र विश्वामित्रहितैषिणा ॥१५२ संतानहेतोर्विभुना गीर्णस्कंधेन धीमता । एकं वेदं चतुष्पादं चतुर्द्धा पुनरीश्वरः ॥१५३ तथा बिभेद भगवान् व्यासः शार्वाद्वनुग्रहात् । तस्य शिष्यप्रशिष्यैश्च शाखा वेदायुताः कृताः ॥१५४

भूतगणों की प्रवृत्तियां और प्रसूत भूतों के फल कहे जाते हैं । ऋषियों के समुदाय के पापों का नाश कर देने वाला सर्ग कहा जाता है । ।१४८। वसिष्ठ मुनि का प्रादुर्भाव और शक्ति का जन्म उसी प्रकार से बतलाया गया है । विश्वामित्र के द्वारा किया हुआ इस सौदान की अस्थियों का ग्रहण कहा गया है ।१४९। अदृश्यन्ती में विभु पराशर की उत्पत्ति कही गयी है । अपने पिता की कन्या के उदर से महामुनि व्यासदेव ने जन्म ग्रहण किया था ।१५०। धीमान् सह पुत्र शुकदेव मुनि का जन्म कहा गया है । पराशर ऋषि का विश्वामित्र मुनि को प्रति प्रकृष्ट विद्वेष होता है ।१५१। विश्वामित्र मुनि की हिंसा की इच्छा से अग्नि की वसिष्ठ संभृति का कथन है । विप्र विश्वामित्र के हित की इच्छा वाले देव विधाता ने ऐसा किया था ।१५२। विभु बुद्धिमान् गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और फिर ईश्वर ने चार प्रकार से किया था ।१५३। भगवान् शिव के अनुग्रह से भगवान् व्यासदेव ने उसी भाँति भेद किया था । उस वेद के शिष्यों और प्रविष्टों ने वेद की अयुत शाखायें की थी ।१५४।

प्रयोगे प्रह्वला नैव यथा दृष्टः स्वयंभुवा । पृष्टवन्तो विशिष्टास्ते मुनयो धर्मकांक्षिणः ॥१५५

२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देशं पुण्यमभीप्सतो विभुना तद्धितेषिणा ।
सुनाभं दिव्यरूपामं सप्तांगं शुभशंसनम् ॥१५६
आनौपम्यमिदं चक्रं वर्त्तमानमतंद्रिताः ।
पृष्ठतो यात नियतास्ततः प्राप्स्यथ पाटितम् ॥१५७
गच्छतस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्विशीर्यते ।
पुण्यः स देशो मंतव्यः प्रत्युवाच तदा प्रभुः ॥१५८
उक्त्वा चैवमृषीन्सर्वानदृश्यत्वमुपागमत् ।
गंगा गर्भ यवाहारा नैमिषेयास्तथैव च ॥१५९
ईशिरे चैव सत्रेथ मुनयो नैमिषे तदा ॥१६०
मृते शरद्वति तथा तस्य चोत्थापनं कृतम् ।
ऋषयो नैमिषेयाश्च दयया परया युताः ॥१६१

प्रयोग में प्रह्वला नहीं है जैसा कि स्वयम्भू ने देखा है । धर्म की आकांक्षा रखने वाले उन विशिष्ट मुनियों ने पूछा था ।१५५। जो कि पुण्य देश की इच्छा रखने वाले थे और विभु उनके हित की इच्छा रखने वाले थे । सुनाम-दिव्यरूप और आभा से युक्त-सात अङ्गों वाला और शुभ को बताने वाला था ।१५६। यह उपमा से रहित वर्तमान चक्र था । पीछे से अतन्द्रित होकर नियत वे गमन करें फिर पाटित को प्राप्त हो जायेंगे ।१५७। गमन करते हुए उस चक्र की जहाँ पर ही नेमि विशीर्ण हो जाती है—उस समय में प्रभु ने यही उत्तर दिया था कि उसी देश को पुण्यमत मानना चाहिए ।१५७। इस रीति से उन सब ऋषियों से कहकर वे अदृश्य हो गये थे । गङ्गा के गर्भ में वे नैमिषेय यवों का आहार करने वाले रहे थे ।१५९। उस समय में नैमिष में मुनियों ने सब के द्वारा उपासना की थी ।१६०। शरद्वान् के समाप्त हो जाने पर उसका उत्पादन किया था । वे नैमिषेय ऋषि-गत परमाधिक दया से समन्वित थे ।१६१।

निःसीमां गामिमां कृत्वा कृष्णं राजानमाहरत् ।
प्रीतिं चैव कृतातिथ्यं राजानं विधिवत्तदा ॥१६२
अन्तः सर्गगतः क्रूरः स्वर्भानुरसुरो हरन् ।
द्रुते राजनि राजानु मद्रते मुनयस्ततः ॥१६३