संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यस्य यस्याऽन्वये ये ये तांस्तानिच्छाम वेदितुम् । तेषां पूर्वविसृष्टिं च विचित्रां त्वं प्रजापते । सत्कृत्य परिपृष्टः स महात्मा रोमहर्षणः ॥३४ विस्तरेणानुपूर्व्या च कथयामास सत्तमः । सूत उवाच । यो मे द्वैपायनप्रीतः कथां वै द्विजसत्तमाः ॥३५ पुण्यामाख्यातवान्विप्रास्तां वै वक्ष्याम्यनुक्रमात् । पुराणं संप्रवक्ष्यामि यदुक्तं मातरिश्वना ॥३६
ऋषि व्यासदेव से जो भी कुछ मैंने श्रवण किया है और उस श्रवण करने से जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है जिससे भली-भाँति श्रवण कराने के लिए वह ज्ञान पूर्णतया सत्य है—ऐसा मेरा निश्चय है ।३०। हे उत्तम द्विजगणो ! इस प्रकार से ज्ञान प्राप्त होने पर जो भी कुछ मेरे द्वारा कहा जा सकता है मैं कहूँगा । जिस विषय में आपकी जो भी जानने की इच्छा है। उसको आप आज्ञा देने के योग्य हैं ।३१। मुनिगणों ने उनके इस प्रकार के मधुर भाषण को सुनकर उन्होंने प्रेमाश्रुओं से भरी हुई आँखों वाले सूतजी से फिर कहा था ।३२। आप तो विशेष रूप से निपुण हैं और आपने साक्षात् रूप से श्री व्यासजी का दर्शन किया है । इस कारण से आप इस लोक की सम्पूर्ण उत्पत्ति को विशेष रूप से दिखलाने की कृपा कीजिए ।३३। जिसके वंश में जो-जो भी हुए हैं उन-उन सबको हम जानना चाहते हैं। और आप उनके पूर्व में होने वाली प्रजापति की विचित्र विशेष सृष्टि को भी बतलाइए—यह भी हम सब जानने की इच्छा करते हैं । सत्कार करके उन महात्मा सूतजी से जब पूछा गया था ।३४। तब उन परमश्रेष्ठ महापुरुष ने आनुपूर्वी से विस्तार के साथ कहा था । श्रीसूतजी ने कहा—हे द्विजश्रेष्ठो ! परम प्रसन्न हुए द्वैपायन मुनि ने जो परम पुण्यमयी कथा मुझसे कही थी हे विप्रगणो ! उसको मैं अनुक्रम से कहूँगा । मातरिश्वा ने जो पुराण कहा है उसको मैं बतलाऊँगा ।३५-३६।
पृष्टेन मुनिभिः पूर्वैर्नैमिषीयेर्महात्मभिः । सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च ॥३७ वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् । प्रक्रिया प्रथमः पादः कथायां स्यात्परिग्रहः ॥३८