संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृत्य-समुद्देश्य ] [ ११
अनुषंग उत्पोद्घात उपसंहार एव च । एवं पादास्तु चत्वारः समासात्कीर्तिता मया ॥३९ वक्ष्यामि तान्पुरस्तात्तु विस्तरेण यथाक्रमम् । प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा श्रुतम् ॥४० अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिःसृताः । अङ्गानि धर्मशास्त्रं च व्रतानि नियमास्तथा ॥४१ अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् । महदादिविशेषांतं सृजामीति विनिश्चयः ॥४२
नैमिषारण्य के निवासी महात्मा मुनियों ने पहिले पूछा था। पुराण का लक्षण ही यह है—सर्ग अर्थात् सृष्टि और प्रतिसर्ग अर्थात् उस सृष्टि से होने वाली सृष्टि, वंशों का वर्णन, मन्वन्तर अर्थात् मनुओं का कथन तात्पर्य कौन-कौन मनु किस-किस के पश्चात् हुए ।३७। वंशों में होने वालों का चरित—यह ही पाँचों बातों का होना पुराण का लक्षण है। इसमें भी चार पाद होते हैं—प्रक्रिया पहिला पाद है जो कथा में परिग्रह होता है ।३८। अनुषङ्ग, उत्पोद्घात और उपसहार इस प्रकार से संक्षेप से मैंने चार पाद बतला दिये हैं ।३९। अब पहिले उनको क्रम के अनुसार विस्तार के साथ बतलाऊँगा। सबसे प्रथम सभी शास्त्रों से पूर्व ब्रह्माजी ने पुराण का श्रवण किया था ।४०। इसके पश्चात् उनके मुख से वेद निकले थे और वेद के अङ्ग शास्त्र, धर्मशास्त्र व्रत तथा नियम आदि उनके मुख से निकले थे ।४१। जो अव्यक्त कारण है वह नित्य है और सत् तथा असत् स्वरूप वाला है। महत् आदि लेकर विशेष के अन्त तक का मैं सृजन करता हूँ-ऐसा विशेष निश्चय किया था ।४२।
अंडं हिरण्मयं चैव ब्रह्मणः सूतिरुत्तमा । अंडस्यावरणं वार्धिरपामपि च तेजसा ॥४३ वायुना तस्य वायोश्च खेन भूतादिना ततः । भूतादिर्महता चैव अव्यक्तेनावृतो महान् ॥४४ अन्तर्वर्ति च भूतानामंडमेवोपवर्णितम् । नदीनां पर्वतानां च प्रादुर्भावोऽत्र पठ्यते ॥४५