संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ततः स्वर्णमयी भूमिलोंकालोकश्च कीर्त्यते ।
सप्रमाणा इमे लोकाः सप्तद्वीपा च मेदिनी ॥७३
रूपादयः प्रकीर्त्यन्ते करणात्प्राकृतैः सह ।
सर्वे चैतत्प्रधानस्य परिणामैकदेशिकम् ॥७४
पर्यायपरिमाणं च संक्षेपेणात्र कीर्त्यते ।
सूर्याचन्द्रमसोश्चैव पृथिव्याश्चाप्यशेषतः ॥७५
प्रमाणं योजनाग्रेण सांप्रतैरभिमानिभिः ।
महेन्द्राद्याः शुभाः पुण्या मानसोत्तरमूर्धनि ॥७६
अत ऊर्ध्वगतिश्चोक्ता सूर्यस्यालातचक्रवत् ।
नागवीथ्यक्षवीथ्योश्च लक्षणं च प्रकीर्त्यते ॥७७
योजनों की अग्रता से वहाँ पर उन पर्वतों में जो निवास किया करते हैं उनका भी वर्णन किया जाता है और भारत आदि वर्षों का नदियों के और पर्वतों के साथ वर्णन किया जाता है ।७१। जो कि भूतों से और मतिमान् ध्रुवों के साथ वहाँ पर उपनिविष्ट हैं उनका कीर्त्तन किया जाता है। जम्बू द्वीप आदि द्वीप सात समुद्रों के द्वारा घिरे हुए हैं ।७२। वहाँ पर स्वर्ण से परिपूर्ण है और वहाँ पर लोकालोक नाम वाला पर्वत है—यह बताया जाता है । ये सब लोक प्रमाणों से युक्त हैं और सप्तद्वीप तथा पृथिवी हैं—इनका भी प्रमाण बताया जाता है ।७३। करण से प्राकृतों के साथ-साथ प्रादिक का कीर्त्तन किया जाता है । यह सभी कुछ प्रधान के परिमाण का एक देशिक है अर्थात् यह सब प्रकृति के परिणाम के कारण ही होता है ।७४। इनका पर्याय-परिणाम यहाँ पर बहुत ही संक्षेप के साथ कीर्तित किया जाता है। सूर्य और चन्द्र का तथा पृथिवी का पूर्ण परिणाम बताया जाता है ।७५। इस समय में होने वाले उनके अभिमानी अर्थात् स्वामियों का प्रमाण योजनों के हिसाब से कहा जाता है । मानस के उत्तर में ऊपर परम शुभ और पुण्यमय महेन्द्र आदि हैं—उनका वर्णन है । इसके ऊपर अलात (मशाल) के चक्र की भाँति सूर्य की गति बतायी गयी है । और नागवीथी तथा अक्षवीथी का लक्षण बताया जाता है ।७६-७७।
कोष्ठयोर्लेखयोश्चैव मण्डलानां च योजनैः ।
लोकालोकस्य सन्ध्याया अह्नो विषुवतस्तथा ॥७८