भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कृत्य-समुद्देश्य ] [ १७

लोकपालाः स्थिताश्चोर्ध्वं कीर्त्यन्ते ते चतुर्दिशम् ।
पितॄणां देवतानां च पन्थानौ दक्षिणोत्तरौ ॥७९
गृहिणां न्यासिनां चोक्तो रजः सत्त्वसमाश्रयः ।
कीर्त्यते च पदं विष्णोर्धर्माद्या यत्र च स्थिताः ॥८०
सूर्यचन्द्रमसोश्चारो ग्रहाणां ज्योतिषां तथा ।
कीर्त्यते धृतसामर्थ्यात्प्रजानां च शुभाऽशुभम् ॥८१
ब्रह्मणा निर्मितः सौरः सादनार्थं च स स्वयम् ।
कीर्त्यते भगवान्येन प्रसर्प्पति दिवः क्षयम् ॥८२
स रथाऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्ऋषिभिस्तथा ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः ॥८३
अपां सारमयात्स्यन्दात्कथ्यते च रसस्तथा ।
वृद्धिक्षयौ च सोमस्य कीर्त्येते सोमकारितौ ॥८४

मण्डलों के योजनों के हिसाब से कोष्ठों और लेखों का वर्णन है। लोकालोक की सङ्ख्या का, दिन का तथा विषुवत् का वर्णन किया जाता है ।७८। ऊपर की ओर लोकपाल स्थित रहा करते हैं और उनका कीर्त्तन चारों दिशाओं में किया जाता है। पितृगणों और देवगणों के मार्ग क्रम से दक्षिण और उत्तर में बताये गये हैं ।७९। गृहस्थियों और संन्यासियों का मार्ग रजोगुण और सत्वगुण के समाश्रय वाला कहा गया है और भगवान् विष्णु का स्थान बताया गया है जहां पर धर्म आदि स्थित रहा करते हैं ।८०। सूर्य-चन्द्रमा, ज्योतिर्गण और ग्रहों का सञ्चरण कीर्त्तित किया जाता है जो कि सामर्थ्य के धारण करने से प्रजाजनों के लिए शुभ औद अशुभ हुआ करते हैं। तात्पर्य यह है कि कुछ शुभ ग्रहों की चाल मानवों को शुभ होती है और कुछ पाप ग्रहों के चाल बुरी हुआ करती है ।८१। ब्रह्माजी ने स्वयं ही सौर की रचना सदना करने के लिए की है—ऐसा कीर्त्तित किया जाता है। जिससे भगवान् भुवन भास्कर दिन के अन्त में क्षय को प्राप्त होते हैं ।८२। वह भगवान् सूर्यदेव रथ पर अधिष्ठित हैं और वे देव-असुर-ऋषि-गण-गन्धर्व-अप्सरा गण-ग्रामवासी-सूर्य और राक्षसों के द्वारा जली के सार को प्राप्त करता है और स्यन्द होने से वह रस कहा जाया करता है। चन्द्र द्वारा किये गये सोम के वृद्धि तथा क्षय कहे जाते हैं ।८३-८४।