भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सूर्यादीनां स्यन्दनानां ध्रुवादेव प्रवर्त्तनम् । कीर्त्यते शिशुमारस्य यस्य पुच्छे ध्रुवः स्थितः ॥८५ तारारूपाणि सर्वाणि नक्षत्राणि ग्रहैः सह । निवासा यत्र कीर्त्यन्ते देवानां पुण्यकर्मणाम् ॥८६ सूर्यरश्मिसहस्रं च वर्षशीतोष्णविश्रवः । प्रविभागश्च रश्मीनां नामतः कर्मतीर्थतः ॥८७ परिमाणं गतिश्चोक्ता ग्रहाणां सूर्यसंश्रयात् । वैश्यारूपात्प्रधानस्य परिमाणो महद्भवः ॥८८ पुरूरवस ऐलस्य माहात्म्यस्यानुकीर्त्तनम् । पितॄणां द्विप्रकाराणां माहात्म्यं वामृतस्य च ॥८९ ततः पर्वाणि कीर्त्यन्ते पर्वणां चैव संधयः । स्वर्गलोकगतानाञ्च प्राप्तानाञ्चाप्यधोगतिम् ॥९० पितॄणां द्विप्रकाराणां श्राद्धेनानुग्रहो महान् । युगसंख्याप्रमाणं च कीर्त्यते च कृतं युगम् ॥९१ त्रेतायुगे चापकर्षाद्वार्त्तायाः संप्रवर्त्तनम् । वर्णानामाश्रमाणां च संस्थितिर्धर्मतस्तथा ॥९२

सूर्यादि स्यन्दनों ध्रुव से ही प्रवर्त्तन होता है जिस शिशुमार के पुच्छ में स्थित ध्रुव कीर्त्तित किया जाता है ।८५। ताराओं के रूप वाले समस्त नक्षत्र ग्रहों के साथ रहते हैं जहाँ पर पुण्य कर्मों वाले देवों के निवास बतलाये जाया करते हैं ।८६। सूर्य की सहस्र किरणें, वर्षा, शीत, गर्मी का विस्रवण और रश्मियों का विभाग नाम से और कर्म तीर्थ से हैं ।८७। भगवान् सूर्यदेव के संश्रम से ग्रहों की गति और परिणाम कहे गये हैं । वैश्या रूप से प्रधान का परिमाण महद्भव है ।८८। पुरुरवा और ऐल के माहात्म्य का अनुकीर्त्तन है ।८९। इसके अनन्तर पर्व तथा पर्वों की सन्धियां कही जाती हैं । जो प्राणी स्वर्गलोक में प्राप्त होते हैं और जो अधोगति अर्थात् नरकगामी हैं उनका वर्णन है । दोनों प्रकार के पितृगणों का श्राद्ध करने से बड़ा भारी अनुग्रह होता है । सभी युगों की जितने समय की आयु है उसका