संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृत्य-समुद्देश्य ] [ १६
प्रमाण बताया गया है तथा कृतयुग (सत्ययुग) का वर्णन किया है ।६०-६१। और त्रेतायुग में अपकर्ष से वार्ता की सम्प्रवृत्ति होती है । उसी भांति धर्म से चारों वर्णों की और चारों आश्रमों की संस्थिति होती है ।६२।
वज्रप्रवर्त्तनं चैव संवादा यत्र कीर्त्यते । ऋषीणां वसुना सार्द्धं वसोश्चाधः पुनर्गतिः । शब्दत्वं च प्रधानात्तु स्वायम्भुवमृते मनुम् ॥६३ प्रशंसा तपसश्चोक्ता युगावस्थाश्च कृत्स्नशः । द्वापरस्य कलेश्चापि संक्षेपेण प्रकीर्त्तनम् ॥६४ मन्वन्तरं च संख्या च मानुषेण प्रकीर्त्तिता । मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव च लक्षणम् ॥६५ अतीतानागतानां च वर्त्तमानं च कीर्त्यते । तथा मन्वन्तराणां च प्रतिसंधानलक्षणम् ॥६६ अतीतानागतानां च प्रोक्तं स्वायम्भुवे ततः । ऋषीणां च गतिः प्रोक्ता कालज्ञानगतिस्तथा ॥६७ दुर्गसंख्याप्रमाणं च युगवार्ताप्रवर्त्तनम् । त्रेतायां चक्रवर्त्तीनां लक्षणं जन्म चैव हि ॥६८
और वज्र का प्रवर्त्तन है जहाँ पर सम्वाद कीर्त्तित किया जाता है । ऋषियों का वसु के साथ फिर वसु की अधोगति कही गयी है । और शब्दत्व स्वायम्भुव मनु के विना प्रधान से है ।६३। और तपश्चर्या की प्रशंसा कही गयी है तथा पूर्णतया युगों की अवस्था बतायी है । द्वापर और कलियुग का संक्षेप से कीर्त्तन किया गया है ।६४। मन्वन्तर और संख्या मानुष से कीर्त्तित की गयी है । समस्त मन्वन्तरों का यही लक्षण है ।६५। जो भूत काल में हो चुके हैं और जो भविष्य में होने वाले हैं तथा वर्त्तमान काल का कीर्त्तन किया जाता है । उसी भाँति मन्वन्तरों के प्रति सन्धान का लक्षण है ।६६। बीते हुए और आगतों के स्वायम्भुव के कहने पर फिर ऋषियों की गति कही गयी है तथा काल के ज्ञान की गति बतायी गयी है । दुर्गों की संख्या और प्रमाण तथा युग वार्ता का प्रवर्त्तन है । त्रेतायुग में जो चक्रवर्ती राजा हुए थे उनका लक्षण और जन्म कहा गया है ।६७-६८।