भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रमतेश्च तथा जन्म अथो कलियुगस्य वै । अंगुलैर्ह्लासिमं चैव भूतानां यच्च चोच्यते ॥९९ शाखानां परिसंख्यान शिष्यप्राधान्यमेव च । वाक्यं सप्तविधं चैव ऋषिगोत्रानुकीर्तनम् ॥१०० लक्षणं सूतपुत्राणां ब्राह्मणस्य च कृत्स्नशः । वेदानां व्यसनं चैव वेदव्यासैर्महात्मभिः ॥१०१ मन्वन्तरेषु देवानां प्रजेशनां च कीर्त्तनम् । मन्वन्तरक्रमश्चैव कालज्ञानं च कीर्त्यते ॥१०२ दक्षस्य चापि दौहित्राः प्रियाया दुहितुः शुभाः । ब्रह्मादिभिस्ते जनिता दक्षेणैव च धीमता ॥१०३ सावर्णाश्चाव कीर्त्यन्ते मनवो मेरुमाश्रिताः । ध्रुवस्योत्तानपादस्य प्रजासर्गोपवर्णनम् ॥१०४ चाक्षुषस्य मनो सर्गः प्रजानां वीर्यवर्णनम् । प्रथुणा चैव वैन्येन भूमिदोहप्रवर्त्तता ॥१०५

प्रमति के जन्म का कीर्त्तन और इसके अनन्तर कलियुग के जन्म का वर्णन है । जो व्यतीत हो चुके हैं उनका अँगुली से ह्रास का होना कहा जाता है ।९९। शाखाओं की परिसंख्यों और शिष्यों की प्रधानता कही गयी है । सात प्रकार के वाक्य और ऋषियों के गोत्र का कथन है ।१००। सूत पुत्रों का लक्षण और ब्राह्मण का पूर्ण लक्षण है । महान् आत्मा वाले वेद-व्यासों के द्वारा वेदों का व्यसन बताया गया है ।१०१। मन्वन्तरों में क्षेत्रों का और प्रजापतियों का कीर्त्तन किया गया है । मन्वन्तर का क्रम और काल के ज्ञान का वर्णन किया है ।१०२। दक्ष-प्रजापति की प्यारी बेटी के परम शुभ दौहित्र (धेवते) वर्णित किये गये हैं । धीमान् दक्ष के ही द्वारा ब्रह्मादि से वे उत्पन्न किये थे ।१०३। यहाँ पर मेरु गिरि पर आश्रय लेने वाले सावर्ण मनुओं का कीर्त्तन किया जाता है । उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव की प्रजाओ के उपसर्ग का वर्णन है । चाक्षुष मनु के सर्ग का कथन है और प्रजाओं के वीर्य—पराक्रम का कथन है । प्रभु वैन्य के द्वारा जो भूमि के दोहन करने के लिए प्रवृत्ति हुई थी उसका वर्णन है ।१०४-१०५।