भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

कृत्य-समुद्देश्य ] [ २१

पात्राणां पयसां चैव वत्सानां च विशेषणम् । ब्रह्मादिभिः पूर्वमेव दुग्धा चेयं वसुन्धरा ॥१०६ दशभ्यश्च प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतेः । दक्षस्य कीर्त्यते जन्म समस्यांशेन धीमतः ॥१०७ भूतभव्यभवैशत्वं महेंद्राणां च कीर्त्यते । मन्वादिका भविष्यन्ति आख्यानैर्बहुभिर्वृताः ॥१०८ वैवस्वतस्य च मनोः कीर्त्यते सर्गविस्तरः । ब्रह्मादिकोश उत्पत्तिर्भृग्वादीनां च कीर्त्यते ॥१०९ विनिष्कृष्य प्रजासर्गं चाक्षुषस्य मनोः शुभे । दक्षस्य कीर्त्यते सर्गो ध्यानाद्वैवस्वतांतरे ॥११० नारदः कृतसंवादो दक्षपुत्रान्महाबलान् । नाशयामास शापाय मानसो ब्रह्मणः सुतः ॥१११ ततो दक्षोऽसृजत्कन्यां वैरिणा नाम विश्रुताः । मरुत्प्रवाहे मरुतो दित्यां देव्यां च संभवः ॥११२

पात्रों का, दुग्धों का और वत्सों का विशेषण बताया गया है । पूर्व में ही ब्रह्मा आदि के द्वारा इस वसुन्धरा का दोहन किया गया था ।१०६। दश प्रचेताओं से मारिषा में अंश से समान धीमान् दक्ष के जन्म का कीर्त्तन किया जाता है ।१०७। महेन्द्रों के भूतभव्य और शवेशत्व का कीर्त्तन किया जाता है । बहुत से आख्यानों से युक्त मन्वादिक होंगे ।१०८। वैवस्वत मनु के सर्ग का विस्तार कहा जाता है और ब्रह्मादि कोश और भृगु आदि की उत्पत्ति का वर्णन किया जाता है ।१०९। विनिष्कर्षक करके चाक्षुप मनु के शुभ प्रजा के सर्ग में वैवस्वत के अन्तर में ध्यान से दक्ष के सर्ग का वर्णन किया जाता है ।११०। ब्रह्माजी के मानस अर्थात् मन से समुत्पन्न पुत्र श्री नारद जी ने सम्वाद करके महान् बलवान् दक्ष के पुत्रों को शाप के लिए विनाश युक्त कर दिया था ।१११। इसके अनन्तर प्रजापति दक्ष ने कन्याओं को समुत्पन्न किया था जो कि वैरी के द्वारा नाम विश्रुत हुए थे । मरुत् के प्रवाह में मरुत देवी दिति में समुत्पन्न हुआ था ।११२।

कीर्त्यन्ते मरुतां चात्र गणास्ते सप्त सप्तकाः ।