संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देवत्वमिन्द्रवासेन वायुस्कन्धेषु चाश्रमः ॥११३ दैत्यानां दानवानां च यक्षगंधर्वरक्षसाम् । सर्वभूतपिशाचानां यक्षाणां पक्षिवीरुधाम् ॥११४ उत्पत्ततश्चाप्सरसां कीर्त्यते बहुविस्तरात् । मार्तण्डमण्डलं कृत्स्नं जन्मैरावतहस्तिनः ॥११५ वैनतेयसमुत्पत्तिस्तथा राज्याभिषेचनम् । भृगूणां विस्तरश्चोक्तस्तथा चांगिरसामपि ॥११६ कश्यपस्व पुलस्त्यस्य तथैवात्रेर्महात्मनः । पराशरस्य च मुनेः प्रजानां यत्र विस्तरः ॥११७ तिस्रः कन्याः सुकीर्त्यन्ते यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । इच्छाया विस्तरश्चोक्त आदित्यस्य ततः परम् ॥११८ किकुविच्चरितं प्रोक्तं ध्रुवस्यैव निवर्हणम् । वृहद्वलानां संक्षेपादिक्ष्वाक्वाद्याः प्रकीर्त्तितः ॥११९॥
इसमें मरुतों के गणों के सात सप्तक अर्थात् उनचास कीर्त्तित किये जाते हैं। इनको इन्द्र के वास होने से देवत्व है तथा वायु के स्कन्धों में आश्रम है ।११३। दैत्यों की—दानवों की और यक्ष—गन्धर्व तथा राक्षसों की—सब भूत और पिशाचों की—यक्षों की—पक्षियों की और वीरुधों की उत्पत्तियाँ हुई थीं ।११४। इन सबकी उत्पत्तियों का और अप्सराओं की उत्पत्ति का बहुत विस्तृत कीर्त्तन किया जाता है। सम्पूर्ण मार्तण्ड मण्डल का और ऐरावत हस्ती का जन्म बताया गया है ।११५। वैनतेय की उत्पत्ति और राज्य पर अभिषेक का वर्णन है। भृगुओं का और अङ्गिराओं का विस्तार कहा गया है ।११६। जहाँ पर कश्यप—पुलस्त्य और महात्मा अत्रि का तथा पराशर मुनि की प्रजाओं का विस्तार बताया गया है ।११७। तीन कन्याऐं बतायी जाती हैं जिनमें सबलोक प्रतिष्ठित हैं। इच्छा का विस्तार कहा गया है और इसके बाद आदित्य का विस्तृत वर्णन है ।११८। किकुवित् का चरित कहा गया है। ध्रुव का निवर्हण है। वृहद्बलों का वर्णन है और संक्षेप से इक्ष्वाकु आदि कहे गये हैं ।११९।
निश्यादीनां क्षितीशानां पलांडुहरणादिभिः । कीर्त्यते विस्तरात्सर्गो ययातेरपि भूपतेः ॥१२०॥