संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देवत्वमिन्द्रवासेन वायुस्कन्धेषु चाश्रमः ॥११३ दैत्यानां दानवानां च यक्षगंधर्वरक्षसाम् । सर्वभूतपिशाचानां यक्षाणां पक्षिवीरुधाम् ॥११४ उत्पत्ततश्चाप्सरसां कीर्त्यते बहुविस्तरात् । मार्तण्डमण्डलं कृत्स्नं जन्मैरावतहस्तिनः ॥११५ वैनतेयसमुत्पत्तिस्तथा राज्याभिषेचनम् । भृगूणां विस्तरश्चोक्तस्तथा चांगिरसामपि ॥११६ कश्यपस्व पुलस्त्यस्य तथैवात्रेर्महात्मनः । पराशरस्य च मुनेः प्रजानां यत्र विस्तरः ॥११७ तिस्रः कन्याः सुकीर्त्यन्ते यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । इच्छाया विस्तरश्चोक्त आदित्यस्य ततः परम् ॥११८ किकुविच्चरितं प्रोक्तं ध्रुवस्यैव निवर्हणम् । वृहद्वलानां संक्षेपादिक्ष्वाक्वाद्याः प्रकीर्त्तितः ॥११९॥
इसमें मरुतों के गणों के सात सप्तक अर्थात् उनचास कीर्त्तित किये जाते हैं। इनको इन्द्र के वास होने से देवत्व है तथा वायु के स्कन्धों में आश्रम है ।११३। दैत्यों की—दानवों की और यक्ष—गन्धर्व तथा राक्षसों की—सब भूत और पिशाचों की—यक्षों की—पक्षियों की और वीरुधों की उत्पत्तियाँ हुई थीं ।११४। इन सबकी उत्पत्तियों का और अप्सराओं की उत्पत्ति का बहुत विस्तृत कीर्त्तन किया जाता है। सम्पूर्ण मार्तण्ड मण्डल का और ऐरावत हस्ती का जन्म बताया गया है ।११५। वैनतेय की उत्पत्ति और राज्य पर अभिषेक का वर्णन है। भृगुओं का और अङ्गिराओं का विस्तार कहा गया है ।११६। जहाँ पर कश्यप—पुलस्त्य और महात्मा अत्रि का तथा पराशर मुनि की प्रजाओं का विस्तार बताया गया है ।११७। तीन कन्याऐं बतायी जाती हैं जिनमें सबलोक प्रतिष्ठित हैं। इच्छा का विस्तार कहा गया है और इसके बाद आदित्य का विस्तृत वर्णन है ।११८। किकुवित् का चरित कहा गया है। ध्रुव का निवर्हण है। वृहद्बलों का वर्णन है और संक्षेप से इक्ष्वाकु आदि कहे गये हैं ।११९।
निश्यादीनां क्षितीशानां पलांडुहरणादिभिः । कीर्त्यते विस्तरात्सर्गो ययातेरपि भूपतेः ॥१२०॥
कृत्य-समुद्देश्य ] [ २३
यदुवंशसमुद्देशो हैहयस्य च विस्तरः । क्रोधादनन्तरं चोक्तस्तथा वंशस्य विस्तरः ॥१२१ ज्यामघस्य च माहात्म्यं प्रजासर्गश्च कीर्त्यते । देवावृधस्यांधकस्य धृष्टेश्चापि महात्मनः ॥१२२ अनिमित्रान्वययश्चैव विशोर्मिथ्याभिशंसनम् । विशोधमनुसंप्राप्तिर्मणिरत्नस्य धीमतः ॥१२३ सत्राजितः प्रजासर्गे राजर्षेर्देवमीढुषः । शूरस्य जन्म चाप्युक्तं चरितं च महात्मनः ॥१२४ कंसस्यापि च दौरात्म्यमेकीवंश्यात्समुद्भवः । वासुदेवस्य देवक्यां विष्णोरमिततेजसः ॥१२५ अनन्तरमृषेः सर्गप्रजासर्गोपवर्णनम् । देवासुरे समुत्पन्ने विष्णुना स्त्रीवधे कृते ॥१२६ संरक्षता शक्रवधं शापः प्राप्तः पुरा भृगोः । भृगुश्चोत्थापयामास दिव्यां शुक्रस्य मातरम् ॥१२७
निष्पादिक नृपों का पलाण्डु हरण आदि के द्वारा भूपति ययाति का भी सर्ग विस्तार पूर्वक कहा गया है ।१२०। राजा यदु के वंश का समुद्देश और हैहय का विस्तार बताया गया है । क्रोध के अनन्तर वंश का विस्तार कहा गया है ।१२१। ज्यामघ का माहात्म्य और उसकी प्रजाओं की उत्पत्ति कीर्त्तित की जाती है । देवा वृध—अन्धक और महान आत्मा वाले धृष्टि का वर्णन किया जाता है ।१२२। अनमित्र का वंश-वर्णन, तथा विश्रु का मिथ्या अभिशंसन और धीमान् मणिरत्न का विरोध तथा अनुसम्प्राप्ति बतायी गयी है ।१२३। राजर्षि देवमीढु के प्रजा के सर्ग में सत्राजित् और शूर का भी जन्म कहा है तथा इस महात्मा का चरित भी बताया गया है ।१२४। राजा कंस की दुरात्मता और एकीवंशत्व से समुत्पत्ति बतायी गयी है । वसुदेव का जन्म और देवकी के गर्भ से अपरिमित तेज वाले भगवान् विष्णु का आविर्भाव हुआ था ।१२५। इसके पश्चात् ऋषि का सर्ग है और प्रजाओं के सर्ग का उपवर्णन है । देवासुर के समुत्पन्न होने पर विष्णु भगवान् के द्वारा स्त्री का वध किये जाने पर ।१२६। इन्द्र के वध का संरक्षण करने वाले ने पहिले
२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भृगु का शाप प्राप्त किया था और भृगु ने शुक्र की दिव्य माता को उठाया था ॥१२७॥
देवानां च ऋषीणां च संक्रमा द्वादशाहृताः । नारसिंहप्रभृतयः कीर्त्यन्ते पापनाशनाः ॥१२८ शुक्रेणाराधनं स्थाणोर्घोरेण तपसा तथा । वरप्रदानकृत्तं न यत्र शर्वंस्तज्वः कृतः ॥१२६ अनन्तरं च निर्दिष्टं देवासुरविचेष्टितम् । जयंत्या सह शक्रेण यत्र शुक्रो महात्ममति ॥१३० असुरान्मोहयामास शक्ररूपेण बुद्धिमान् । वृहस्पति तं शुक्रं शशाप स महाद्युतिः ॥१३१ उक्तं च विष्णोर्माहात्म्यं विष्णोर्जन्मनि शब्द्यते । तुर्वसुश्चात्र दौहित्रो यवीयान्यो यदोरभूत् ॥१३२ अनुद्रुह्यादयः सर्वे तथा तन्तनया नृपाः । अनुवंश्या महात्मानस्तेषां पार्थिवसत्तमाः ॥१३३
देवों के और ऋषियों के संक्रम से द्वादश आहूत हुए थे । नारसिंह प्रभृति पापों के नाश करने वाले कीर्तित किये गये हैं ।१२८। अत्यन्त घोर तप के द्वारा शुक्र देव ने भगवान् शिव की आराधना की थी । फिर उसने वर के प्रदान करने वाले भगवान् शिव की स्तुति की थी ।१२९। इसके उपरान्त देवों और असुरों की विशेष चेष्टा का निर्देश किया गया है जहाँ पर महात्मा में शुक्र ने जयन्ती के साथ इन्द्र ने किया था ।१३०। बुद्धिमान् ने इन्द्र के रूप से असुरों को मोहित कर दिया था । और महती द्युति वाले वृहस्पति ने शुक्राचार्य को शाप दे दिया था ।१३१। भगवान् विष्णु के जन्म में विष्णु का माहात्म्य कहा जाता है । वहाँ पर तुर्वसु दौहित्र था जो यदु का सब से छोटा हुआ था ।१३२। अनुद्रुह्य आदि सब नृप उसके पुत्र हुए थे । उसके महात्मा श्रेष्ठ नृप उनके पीछे वंश में होने वाले हुए थे ।१३३।
कीर्त्यन्ते यत्र कात्स्न्र्येन भूरिद्रविणतेजसः । आतिथ्यस्य तु विप्रर्षेः सप्तधा धर्मसंश्रयात् ॥१३४ बार्हस्पत्यं सूरिभिश्च यत्र शापमुपावृतम् ।
कृत्य-समुद्देश्य ] [ २५
हरवंशयशः स्पर्शः शांतनोर्वीर्य्यशब्दनम् ॥१३५ भविष्यतां तथा राज्ञामुपसंहारशब्दनम् । अनागतानां संघानां प्रभूणां चोपवर्णनम् ॥१३६ भौत्यस्यांते कलियुगे क्षीणे संहारवर्णनम् । नैमित्तिकाः प्राकृतिका यथैवात्यंतिकाः स्मृताः ॥१३७ विविधः सर्वभूतानां कीर्त्यते प्रतिसंचरः । अनावृष्टिर्भास्करस्य घोरः संवर्त्तकानलः ॥१३८ सांख्ये लक्षणमुद्दिष्टं ततो ब्रह्म विशेषतः । ध्रुवादीनां च लोकानां सप्तानां चोपवर्णनम् ॥१३९ अपारार्द्धापरैश्चैव लक्षणं परिकीर्त्यते । ब्रह्माणो योजनाग्रेण परिमाणविनिर्णयः ॥१४० कीर्त्यन्ते चात्र निरयाः पापानां रौरवादयः । सर्वेषां चैव सत्त्वानां परिणामविनिर्णयः ॥१४१
जहाँ पर पूर्णरूप से अधिक द्रव्य और तेज वाले विप्रर्षि के धर्म के संश्रय से आतिथ्य का कीर्त्तन किया जाता है ।१३४। जहाँ पर सूरियों ने वृहस्पति के शाप को प्राप्त किया था। हर वंश के यश का स्पर्श है और राजा शन्तनु के वीर्य पराक्रम का कथन है ।१३५। आगे भविष्य में होने वाले राजाओं के उपसंहार का कथन है। जो अनागत संघ हैं और प्रभु हैं उनका उपवर्णन है ।१३६। भोत्य के अन्त में कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार का वर्णन है। जो भी किसी निमित्त के कारण होने वाले थे, प्राकृतिक थे और जो आत्यन्तिक कहे गये हैं ।१३७। समस्त प्राणियों का अनेक प्रकार का प्रति सञ्चरण था उसका कीर्त्तन किया जाता है। भगवान् भास्कर का दृष्टि में न आने वाला परम घोर संवर्त्तक अनल था ।१३८। सांख्य में लक्षण उद्दिष्ट है इसके बाद विशेष रूप से ब्रह्म का वर्णन है। ध्रुव आदि सात लोकों का उप वर्णन है ।१३९। अपराद्धं परों के द्वारा लक्षण का परिकीर्त्तन किया जाता है। योजनाग्र से ब्रह्म के परिमाण का विशेष निर्णय किया गया है ।१४०। रौरव आदि नरकों का तथा सभी प्राणियों के पापों के निर्णय का वर्णन किया गया है ।१४१।
२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ब्रह्मणः प्रतिसंसर्गात्सर्वसंसारवर्णनम्।
गतिरूर्ध्वमधश्चोक्ता धर्माधर्मसमाश्रया ॥१४२
कल्पे कल्पे च भूतानां महतामपि संक्षयम्।
असंख्यया च दुःखानि ब्रह्मणश्चाप्यनित्यता ॥१४३
दौरात्म्यं चैव भोगानां संहारस्य च कष्टता।
दुर्लभत्वं च मोक्षस्य वैराग्याद्दोषदर्शनात् ॥१४४
व्यक्ताव्यक्तं परित्यज्य सत्त्वं ब्रह्मणि संस्थितम्।
नानात्वदर्शनाच्छुद्धस्तवस्तत्र निवर्त्तते ॥१४५
ततस्तापत्रयाद् भीतो रूपार्थो हि निरंजनः।
आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य न विभेति कुश्चन ॥१४६
कीर्त्यते च पुनः सर्गो ब्रह्मणोऽन्यस्य पूर्ववत्।
कीर्त्यते जगतश्चात्र सर्गप्रलयविक्रियाः ॥१४७
ब्रह्मा के प्रति संसर्ग से सब संसार का वर्णन होता है। धर्म और अधर्म के समाश्रय वाली ऊर्ध्वगति और अधोगति कही गयी है ।१४२। कल्प कल्प में महान् भूतों का भी संक्षय होता है और असंख्य दुःख होते हैं तथा ब्रह्मा की भी नित्यता नहीं है अर्थात् ब्रह्मा का भी विनाश होता है ।१४३। भोगों की दुरात्मता है अर्थात् भोगी का बुरा प्रभाव होता है और संहार के समय में बड़ा कष्ट होता है। दोषों के देखने से जो वैराग्य उत्पन्न होता है वह बहुत कठिन है और मोक्ष होना महान दुर्लभ है ।१४४। व्यक्त और अव्यक्त का पूर्ण सत्व ब्रह्म में संस्थित हो जाता है। नाना रूपता के दर्शन से वहाँ पर शुद्ध स्तव निवृत्त हो जाया करता है ।१४५। इसके अनन्तर तीनों (आधिभौतिक-आधिदैविक आध्यात्मिक) तापों से भयभीत होता हुआ रूपार्थ निरञ्जन ब्रह्म के आनन्द को प्राप्त करके फिर कही से भी नहीं डरता है ।१४६। फिर पूर्व की ही भाँति अन्य ब्रह्मा के सर्ग का कीर्त्तन किया जाता है। इसमें जगत की सृष्टि-प्रलय और विक्रिया का कीर्त्तन किया जाता है ।१४७।
प्रवृत्तयश्च भूतानां प्रसूतानां फलानि च।
कीर्त्यते ऋषिवर्गस्य सर्गः पापप्रणाशनः ॥१४८
२७ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रादुर्भावो वसिष्ठस्य शक्तोर्जन्म तथैव च । सौदासास्थिग्रहश्चास्य विश्वामित्रकृतेन तु ॥१४९ पराशरस्य चोत्पत्तिरदृश्यन्त्यां तथा विभोः । संजज्ञे पितृकन्यायां व्यासश्चापि महामुनिः ॥१५० शुकस्य च तथा जन्म सह पुत्रस्य धीमतः । पराशरस्य प्रद्वेषो विश्वामित्रऋषि प्रति ॥१५१ वसिष्ठसंभृतिश्चाग्नेर्विश्वामित्रजिघांसया । देवेन विधिना विप्र विश्वामित्रहितैषिणा ॥१५२ संतानहेतोर्विभुना गीर्णस्कंधेन धीमता । एकं वेदं चतुष्पादं चतुर्द्धा पुनरीश्वरः ॥१५३ तथा बिभेद भगवान् व्यासः शार्वाद्वनुग्रहात् । तस्य शिष्यप्रशिष्यैश्च शाखा वेदायुताः कृताः ॥१५४
भूतगणों की प्रवृत्तियां और प्रसूत भूतों के फल कहे जाते हैं । ऋषियों के समुदाय के पापों का नाश कर देने वाला सर्ग कहा जाता है । ।१४८। वसिष्ठ मुनि का प्रादुर्भाव और शक्ति का जन्म उसी प्रकार से बतलाया गया है । विश्वामित्र के द्वारा किया हुआ इस सौदान की अस्थियों का ग्रहण कहा गया है ।१४९। अदृश्यन्ती में विभु पराशर की उत्पत्ति कही गयी है । अपने पिता की कन्या के उदर से महामुनि व्यासदेव ने जन्म ग्रहण किया था ।१५०। धीमान् सह पुत्र शुकदेव मुनि का जन्म कहा गया है । पराशर ऋषि का विश्वामित्र मुनि को प्रति प्रकृष्ट विद्वेष होता है ।१५१। विश्वामित्र मुनि की हिंसा की इच्छा से अग्नि की वसिष्ठ संभृति का कथन है । विप्र विश्वामित्र के हित की इच्छा वाले देव विधाता ने ऐसा किया था ।१५२। विभु बुद्धिमान् गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और फिर ईश्वर ने चार प्रकार से किया था ।१५३। भगवान् शिव के अनुग्रह से भगवान् व्यासदेव ने उसी भाँति भेद किया था । उस वेद के शिष्यों और प्रविष्टों ने वेद की अयुत शाखायें की थी ।१५४।
प्रयोगे प्रह्वला नैव यथा दृष्टः स्वयंभुवा । पृष्टवन्तो विशिष्टास्ते मुनयो धर्मकांक्षिणः ॥१५५
२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देशं पुण्यमभीप्सतो विभुना तद्धितेषिणा ।
सुनाभं दिव्यरूपामं सप्तांगं शुभशंसनम् ॥१५६
आनौपम्यमिदं चक्रं वर्त्तमानमतंद्रिताः ।
पृष्ठतो यात नियतास्ततः प्राप्स्यथ पाटितम् ॥१५७
गच्छतस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्विशीर्यते ।
पुण्यः स देशो मंतव्यः प्रत्युवाच तदा प्रभुः ॥१५८
उक्त्वा चैवमृषीन्सर्वानदृश्यत्वमुपागमत् ।
गंगा गर्भ यवाहारा नैमिषेयास्तथैव च ॥१५९
ईशिरे चैव सत्रेथ मुनयो नैमिषे तदा ॥१६०
मृते शरद्वति तथा तस्य चोत्थापनं कृतम् ।
ऋषयो नैमिषेयाश्च दयया परया युताः ॥१६१
प्रयोग में प्रह्वला नहीं है जैसा कि स्वयम्भू ने देखा है । धर्म की आकांक्षा रखने वाले उन विशिष्ट मुनियों ने पूछा था ।१५५। जो कि पुण्य देश की इच्छा रखने वाले थे और विभु उनके हित की इच्छा रखने वाले थे । सुनाम-दिव्यरूप और आभा से युक्त-सात अङ्गों वाला और शुभ को बताने वाला था ।१५६। यह उपमा से रहित वर्तमान चक्र था । पीछे से अतन्द्रित होकर नियत वे गमन करें फिर पाटित को प्राप्त हो जायेंगे ।१५७। गमन करते हुए उस चक्र की जहाँ पर ही नेमि विशीर्ण हो जाती है—उस समय में प्रभु ने यही उत्तर दिया था कि उसी देश को पुण्यमत मानना चाहिए ।१५७। इस रीति से उन सब ऋषियों से कहकर वे अदृश्य हो गये थे । गङ्गा के गर्भ में वे नैमिषेय यवों का आहार करने वाले रहे थे ।१५९। उस समय में नैमिष में मुनियों ने सब के द्वारा उपासना की थी ।१६०। शरद्वान् के समाप्त हो जाने पर उसका उत्पादन किया था । वे नैमिषेय ऋषि-गत परमाधिक दया से समन्वित थे ।१६१।
निःसीमां गामिमां कृत्वा कृष्णं राजानमाहरत् ।
प्रीतिं चैव कृतातिथ्यं राजानं विधिवत्तदा ॥१६२
अन्तः सर्गगतः क्रूरः स्वर्भानुरसुरो हरन् ।
द्रुते राजनि राजानु मद्रते मुनयस्ततः ॥१६३
कृत्य-समुद्देश्य ] [ २९
गंधर्वरक्षितं दृष्ट्वा कलापग्रामकेतनम् । सन्निपातः पुनस्तस्य तथा यज्ञे महर्षिभिः ॥१६४ दृष्ट्वा हिरण्मयं सर्वं विवादस्तस्य तैरभूत् । तदा वै नैमिषेयानां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥१६५ तथा विवदमानैश्च यदुः संस्थापितश्च तैः । जनयित्वा त्वरण्यं वै यदुपुत्रमथायुतम् ॥१६६ समापयित्वा तत्सत्रं वायुं ते पर्युपासत । इति कृत्यसमुद्देशः पुराणांशोपवर्णितः ॥१६७ अनेनानुक्रमेणैव पुराणं संप्रकाशते । सुखमर्थः समासेन महानप्युपलक्ष्यते ॥१६८
इस भूमि को सीमा से रहित करके उन्होंने राजा कृष्ण का आहरण किया था। उस समय में उन्होंने विधि के साथ प्रीति को प्रदर्शित किया था और उनका भली-भाँति आतिथ्य भी किया था। १६२। अन्दर से क्रूर और सब जगह जाने वाले स्वर्भानु असुर ने हरण किया था। राजा के शीघ्र जाने पर मुनि राजा के ही पीछे मुदित हो गये थे। १६३। कलाप ग्राम केतन को गन्धर्वों के द्वारा सुरक्षित देखकर फिर उसका सन्निपात हुआ था। उसी प्रकार से यज्ञ में महर्षियों ने देखा था। १६४। वहाँ पर सभी कुछ सुवर्णमय उन्होंने देखा था और उनका उसके साथ विवाद हुआ था। उस अवसर पर नैमिषेयों का वह सत्र (यज्ञ) बारह वर्ष का था उस यज्ञ में ।१६५। उस भाँति परस्पर में विवाद करने वाले उन्होंने यदु को संस्थापित किया था। इसके अनंतर अयुत यदु के पुत्रों वाले उस अरण्य को बचा दिया था। १६६। उस यज्ञ की परिसमाप्ति करके उन्होंने वासुदेव की उपासना की थी। यह कृत्यों का समुद्देश है जो पुराण के इस अंश में उपवर्णित किया गया है। ।१६७। इसी अनुक्रम से यह पुराण संप्रकाशित होता है समास से सुख अर्थ होता है और इससे महान् भी उपलक्षित होता है। १६८।
तस्मात्समासमुद्दिश्य वक्ष्यामि तव विस्तरम् । पादमाद्यमिदं सम्यग् योऽधीते विजितेन्द्रियः ॥१६९ तेनाधीतं पुराणं स्यात्सर्वं नास्त्यत्र संशयः । यो विद्याच्चतुरो वेदान् सांगोपनिषद्विजः ॥१७०
[ ३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ।
विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥१७१
अभ्यसन्निममध्यायं साक्षात्प्रोक्तं स्वयंभुवा ।
नापदं प्राप्य मुह्येत यथेष्टां प्राप्नुयाद्गतिम् ॥१७२
यस्मात्पुरा ह्यभूच्चैतत्पुराणं तेन तत्स्मृतम् ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१७३
अतश्च संक्षेपमिमं शृणुध्वं नारायणः सर्वमिदं पुराणम् ।
संसर्गकालेऽपि करोति सर्गं संहारकाले च न
वास्ति भूयः ॥१७४
इस कारण से समास का उद्देश्य करके आपको विस्तार से कहूँगा । जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाला पुरुष इस आद्य पाद का भली-भाँति से अध्ययन किया करता है ।१६६। उसने इस सम्पूर्ण पुराण का ही मानों अध्ययन कर लिया है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । द्विज-गणों ! अङ्गों और उपनिषदों के सहित जिसने चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है ।१७०। इतिहास पुराणों से वेद को समुपबृंहित करना चाहिए । जो बहुत ही कम पढ़ा लिखा पुरुष है उससे वेद भी भय खाता है कि यह मेरे ऊपर प्रहार करेगा ।१७१। साक्षात् स्वयम्भू ने स्वयं कहा है कि इस अध्याय के अभ्यास करने वाला पुरुष आपदा को प्राप्त करके भी कभी मोह को प्राप्त नहीं हुआ करता है और अपनी अभीष्ट गति को प्राप्त कर लिया करता है ।१७२। कारण यह है कि यह पुराण प्राचीन काल में हुआ था और उनने यह कहा था कि जो इसके निरुक्त जानता है वह सब प्रकार के पापों से प्रमुक्त हो जाया करता है ।१७३। इसलिए इसके संक्षेप का श्रवण करो । यह सम्पूर्ण पुराण साक्षात् भगवान् नारायण का ही स्वरूप है । संसर्ग काल में भी सर्ग करता है और संहार के काल में फिर नहीं होता है ।१७४।
नैमिषाख्यान वर्णनम्
प्रत्यवोचन्पुनः सूतमृषयस्ते तपोधनाः ।
कुत्र सत्रं समभवत्तेषामद्भुतकर्मणाम् ॥१
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३१
कियन्तं चैव तत्कालं कथं च समवर्त्तत ।
आचचक्षे पुराणं च कथं तत्सप्रभंजनः ॥२
आचख्यो विस्तरेणैव परं कौतूहलं हि नः ।
इति संचोदितः सूतः प्रत्युवाच शुभं वचः ॥३
शृणुध्वं यत्र ते धीरा मेनिरे सत्रमुत्तमम् ।
यावन्तं चाभवत्कालं यथा च समवर्तत ॥४
सिसृक्षमाणो विश्वं हि यजते विसृजत्पुरा ।
सत्रं हि तेऽतिपुण्यं च सहस्रपरिवत्सरान् ॥५
तपोगृहपतेर्यत्र ब्रह्मा चैवाभवत्स्वयम् ।
इडाया यत्र पत्नीत्वं शामित्रं यत्र बुद्धिमान् ॥६
मृत्युश्चके महातेजास्तस्मिन्सत्रे महात्मनाम् ।
विबुधाश्चोषिरे तत्र सहस्रपरिवत्सरान् ॥७
तपश्चर्या के धन वाले उन ऋषियों ने श्रीसूतजी से फिर कहा था कि उन अद्भुत कर्मों के करने वालों का वह यज्ञ कहाँ पर हुआ था ।१। वह समय जिसमें यज्ञ का यजन हुआ था कितना था और वह किस प्रकार से सम्पन्न हुआ था ? । वायुदेव ने पुराण की किस रीति से कहा था ? ।२। उन्होंने बहुत विस्तार के साथ इस पुराण का कथन किया था—इसमें हम सबके हृदय में बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है । इस प्रकार से जब प्रेरित किया गया था तो श्री सूतजी ने परम शुभ वचन से उत्तर दिया था ।३। हे मुनियो ! आप लोग श्रवण कीजिए । जहाँ पर उन धीरों ने उस उत्तम सत्र को किया था । और जितने समय पर्यन्त वह वहाँ पर हुआ था और जिस रीति से हुआ था ।४। इस विशाल विश्व का सृजन करने की इच्छा वाला यजन करता है तब पहिले विसृजन करता है । यह सत्र अत्यधिक पुण्य मय है जो कि एक सहस्र परिवत्स्रों तक हुआ था ।५। जहाँ पर गृहपति का ब्रह्मा तप स्वयं ही हुआ था और जिसमें पत्नीत्व इडा का था और जहाँ बुद्धिमान् शामित्र था ।६। उन महान् आत्माओं वालों के यज्ञ में महातेज वाले मृत्यु ने सब किया था । सहस्र परिवत्स्रों तक वहाँ पर देवगणों ने निवास किया था ।७।
भ्रमतो धर्मचक्रस्य यत्र नेमिरशीर्यत ।
३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कर्मणा तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् ॥८ यत्र सा गोमती पुण्या सिद्धचारणसेविता । रोहिणी ससुता तत्र गोमती साभवत् क्षणात् ॥६ शक्तिर्ज्येष्ठा समभवद्वसिष्ठस्य महात्मनः । अरुन्धत्याः सुतायात्रादानमुत्तमतेजसः ॥१० कल्माषपादो नृपतिर्यत्र शक्रश्च शक्तिना । यत्र वैरं समभवद्विश्वामित्रवसिष्ठयोः ॥११ अदृश्यंत्यां समभवन्मुनिर्यत्र पराशरः । पराभवो वसिष्ठस्य यस्य ज्ञाने ह्यवर्त्तयत् ॥१२ तत्र ते मेनिरे शैलं नैमिषे ब्रह्मवादिनः । नैमिषं जज्ञिरे यस्मान्नैमिषीयास्ततः स्मृताः ॥१३ तत्सत्रमभवत्तेषां समा द्वादश धीमताम् । पुरूरवसि विक्रांते प्रशासति वसुन्धराम् ॥१४
भ्रमण करते हुए धर्म चक्र की नेमि जहां पर शीर्ण हो गयी थी । उस कर्म से मुनियों के द्वारा समर्चित नैमिष विख्यात हुआ था ।८। जहाँ परम पुण्यमयी गोमती नदी है जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सदा सेवित रहा करती है । वहाँ पर ससुता रोहिणी एक ही क्षणमात्र में वह गोमती हो गयी थी ।६। महात्मा वसिष्ठ की शक्ति ज्येष्ठा हुई थी जो उत्तम तेज वाली अरुन्धती की सुता का यात्रा दान था ।१०। कल्माषपाद नृप और शक्ति के सहित इन्द्रदेव थे जहां पर विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि का वैर हुआ था ।११। जिस स्थल पर अदृश्यन्ती में पराशर मुनि ने जन्म ग्रहण किया था । जिसके ज्ञान में वसिष्ठ मुनि का पराभव हुआ था ।१२। वहां पर उन ब्रह्म वादियों ने उस शैल को नैमिष माना था । क्योंकि वहां पर नैमिष यजन किया था अतएव तभी से वे सब नैमिष कहे गये थे ।१३। वह सत्र उन बुद्धिमानों का द्वादश वर्षों तक हुआ था जबकि विक्रमी पुरूरवा नृप इस वसुन्धरा पर शासन कर रहा था ।१४।
अष्टादश समुद्रस्य द्वीपानश्नन् पुरूरवाः । तुतोष नैव रत्नानां लोभादिति हि नः श्रुतम् ॥१५
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३३
उर्वशी चकमे तं च देवदूतप्रचोदिता । आजहार च तत्सत्रमुर्वश्या सह संगतः ॥१६ तस्मिन्नरपतौ सत्रे नैमिषीयाः प्रचक्रिरे । यं गर्भं सुषुवे गङ्गा पावकाद्दीप्ततेजसम् ॥१७ तत्तुल्यं पर्वते न्यस्तं हिरण्यं समपद्यत । हिरण्मयं ततश्चक्रे यज्ञवाटं महात्मनाम् ॥१८ विश्वकर्मा स्वयं देवो भावनो लोकभावनः । स प्रविश्य ततः सत्रं तेषाममिततेजसाम् ॥१९ ऐडः पुरूरवा भेजे तं देशं मृगयां चरन् । तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं यज्ञवाटं हिरण्मयम् ॥२० लोभेन हतविज्ञानस्तदादातुमुपाक्रमत् । नैमिषेयास्ततस्तस्य चुक्रुधुर्नृपतिं भृशम् ॥२१
अट्ठारह समुद्र के द्वीपों का अशन करते हुए भी पुरूरवा लोभ से रत्नों से सन्तुष्ट न हुआ था—ऐसा हमने सुना है ।१५। देवदूतों के द्वारा प्रेरित हुई उर्वशी ने उसको अपना पति बनाने की कामना की थी । उर्वशी के साथ संगत होकर उसने उस सत्र का आहरण किया था ।१६। उस नर पति के होने पर नैमिषीयों ने सत्र किया था । गंगा ने पावक से दीप्त तेज वाले जिस गर्भ का प्रसव किया था ।१७। उसके तुल्य पर्वत में न्यस्त किया हुआ हिरण्य (सुवर्ण) हो गया था । इसके अनन्तर उन महात्माओं को हिरण्मय कर दिया था ।१८। लोकों को प्रसन्न करने वाले परम भावुक विश्वकर्मा स्वयं देव था । उन अपरिमित तेज वालों के सत्र में फिर उस विश्वकर्मा ने प्रवेश किया था । ऐड पुरूरवा ने शिकार करते हुए उस देश का सेवन किया था । उसने जब देखा था कि वह यज्ञ का स्थल एकदम सुवर्णमय है तो उसको महान् आश्चर्य हुआ था ।१९-२०। लोभ के कारण उस राजा का सब ज्ञान नष्ट हो गया था और उसने उसको स्वयं ग्रहण करने का उपक्रम किया था । तब तो जो नैमिषीय मुनिगण वहाँ पर थे वे उस राजा पर बहुत क्रुद्ध हुए थे ।२१।
निजघ्नुश्चापि तं क्रुद्धाः कुशवज्रैर्मनीषिणः । तपोनिष्ठाश्च राजानं मुनयो देवचोदिताः ॥२२
३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कुशवज्रैर्बिनिष्पिष्टः स राजा व्यजहात्तनुम्। और्वशेयैस्ततस्तस्य युद्धं चक्रे नृपो भुवि ॥२३ नहुषस्य महात्मानं पितरं यं प्रचक्षते। स तेष्ववभृथेष्वेव धर्म्मशीलो महीपतिः ॥२४ आयुरार्यभवायाग्र्यमस्मिन् सत्रे नरोत्तमः। शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा ॥२५ सत्रमारेभिरे कत्तुं पृथ्वीवत्सात्ममूर्तयः। बभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्यं महात्मनाम् ॥२६ विश्वं सिसृक्षमाणानां पुरा विश्वसृजामिव। वैखानसैः प्रियसखैर्वालखिल्यैर्मरीचिभिः ॥२७ अजैश्च मुनिभिर्जातं सूर्यवैश्वानरप्रभः। पितृदेवाप्सरः सिद्धैर्गंधर्वोरगचारणैः ॥२८
उन मनीषियों ने बहुत क्रोधित होते हुए कुश के वज्रों से उसका हनन किया था क्योंकि वे मुनिगण तपश्चर्या में निष्ठा रखने वाले और दैव के द्वारा प्रेरित थे ।२२। कुशाओं के वज्रों से पिसकर उस राजा ने अपना शरीर त्याग दिया था। उसके अनन्तर भूमि में उसके उर्वशी के पुत्रों के साथ नृप ने युद्ध किया था ।२३। नहुष के जिसको महात्मा पिता कहते हैं। उन अवभृथों में ही वह महीपति बहुत ही धर्मशील था ।२४। इस सत्र में वह नरश्रेष्ठ आयुराय और जन्म से बहुत श्रेष्ठ था। उस समय में ब्रह्म वेत्ताओं ने राजा को शान्त किया था ।२५। आत्म मूर्ति वाले उन्होंने पृथ्वी के समान सत्र करने का आरम्भ कर दिया था उनके सत्र में उन महात्माओं का ब्रह्मचर्य हुआ था ।२६। विश्व के सृजन करने की इच्छा वाले का प्राचीनकाल में विश्व के स्रष्टाओं की भांति वैखानस-प्रियसखा-बालखिल्य-मरीचियों-अज और मुनिगण-पितृगण-देव-अप्सरा-सिद्ध-गन्धर्व-उरग और चारण के साथ वह सूर्य तथा वैश्वानर के समान प्रभा वाला हुआ था ।२७-२८।
भारतैः शुशुभे राजा देवैरिन्द्रसमो यथा। स्तोत्रशस्त्रैर्गृहैर्देवान्पितॄन्पिश्यद्य कर्मभिः ॥२९ आनर्चुःस्म यथाजाति गंधर्वादीन् यथाविधि।
नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३५
आराधने स सस्मार ततः कर्मान्तरेषु च ॥३० जगुः सामानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । व्याजहुर्मुंनयो वाचं चित्राक्षरपदां शुभाम् ॥३१ मन्त्रादि तत्र विद्वांसो जजपुश्च परस्परम् । वितंडावचनैश्चैव निजघ्नुः प्रतिवादिनः ॥३२ ऋषयश्चैव विद्वांसः शब्दार्थन्यायकोविदाः । न तत्र हारितं किंचिद्विविशुर्न ह्मराक्षसाः ॥३३ नैव यज्ञहरा दैत्या नैव वाजमुखास्त्रिणः । प्रायश्चित्तं दरिद्रं च न तत्र समजायत । ३४ शक्तिप्रज्ञाक्रियायोगैर्विधिराशीष्वनुष्ठितः । एवं च ववृधे सत्रं द्वादशाब्दं मनीषिणाम् ॥३५
भारतीयों के द्वारा राजा देवगणों से इन्द्र के समान शोभायुक्त हुआ था। शस्त्रों-स्तोत्रों और गृहों से देवगणों का तथा पित्र्य कर्मों से पितृगणों का और गन्धर्व आदि का जाति के अनुसार विधिपूर्वक किया करते थे। उसने आराधना में और फिर अन्य कर्मों में स्मरण किया था ।२९-३०। गन्धर्वगण सामवेद के मन्त्रों का गान कर रहे थे परम शुभ और विचित्र अक्षरों और पदों से युक्त वाणी का उच्चारण कर रहे थे जो परम शुभ थी ।३१। वहाँ पर विद्वान् लोग परस्पर में मन्त्रों का जप करते थे। प्रतिवादी गण वितण्डावाद के वचनों के द्वारा निहनन कर रहे थे ।३२। ऋषिगण और शब्दार्थ तथा न्याय के ज्ञाता वहाँ पर थे। वहां पर कुछ भी हारित नहीं था और ब्रह्मराक्षसों ने प्रवेश किया था ।३३। दैत्यगण यज्ञ के हरण करने वाले नहीं थे और वाजमुख अस्त्र आदि थे। प्रायश्चित्त और दरिद्रता वहाँ पर नहीं थे ।३४। शक्ति-प्रजा और क्रिया के योगों से आशिषों में विधि अनुष्ठित की गयी थी। इस रीति से वह यज्ञ मनीषियों का बारह वर्ष पर्यन्त वृद्धि युक्त हुआ था ।३५।
ऋषीणां नैमिषीयाणां तदभूदिव वज्रिणः । वृद्धाश्च ऋत्विजो वीरा ज्योतिष्टोमान् पृथक्पृथक् ॥३६ चक्रिरे पृष्ठगमनाः सर्वानियुतदक्षिणान् ।
३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समाप्तयज्ञो यत्रास्ते वासुदेवं महाधिपम् ॥३७ पप्रच्छुरमितात्मानं भवद्बिभ्यर्थदहं द्विजः । प्रचोदितः स्ववंशार्थं स च तानब्रवीत्प्रभुः ॥३८ शिष्यः स्वयंभुवो देवः सर्वं प्रत्यक्षदृग्वशी । अणिमादिभिरष्टाभिः सूक्ष्मैरंगैः समन्वितः ॥३६ तिर्यग्वातादिभिर्वर्षैः सर्वांल्लोकान्बिभर्ति यः । सप्तस्कन्धा भूताः शाखाः सर्वतोयाजराजरात् ॥४० विषयैर्मरुतो यस्य संस्थिताः सप्तसप्तकाः । व्यूहत्रयाणां सूतानां कुर्वन् सत्रं महाबलः ॥४१ तेजसश्चाप्युयानां दधातीह शरीरिणः । प्राणाद्या वृत्तयः पञ्च धारणानां स्ववृत्तिभिः ॥४२ ऋषियों का जो कि नैमिषीय थे वह सत्र इन्द्र के समान हुआ था । वृद्धाश्च-ऋत्विज और वीर पीछे की ओर गमन करने वाले होते हुए ज्योति- ष्टोमों को पृथक् २ सबको अयुत दक्षिणा वाले कर रहे थे । जहाँ पर यज्ञ समाप्त हुआ था वहाँ पर महान् अधिप भगवान् वासुदेव से जो कि अमित आत्मा वाले थे पूछा था कि आपने मुझ ब्राह्मण को प्रेरित किया था कि अपने वंश के लिए यह करो । और उन प्रभु ने उनसे कहा था ।३६-३८। शिष्य वशी देव स्वयंभुव है जो प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला है और अणिमा आदि आठों सूक्ष्म अङ्गों से समन्वित रहते हैं ।३६। जोकि तिर्यग्वात आदि वर्षों से समस्त लोकों का भरण किया करते हैं । सात स्कन्धशाखाओं से भृत थे और विषयों से सर्व तो या जराजर युक्त थे जिसके मरुत् सप्त सप्तक संस्थित महाबल सूत तीनों व्यूहों का सत्र कर रहा था ।४०-४१। उपायों के शरीर धारी तेज का यहां पर धारण करता है । धारणाओं की प्राणाद्य पांच वृत्तियां अपनी वृत्तियों से युक्त थी ।४२। पूर्णमाणः शरीराणां धारणं यस्य कुर्वते । आकाशयोनिर्द्विगुणः शब्दस्पर्शसमन्वितः ॥४३ वाचोरणिः समाख्याता शब्दशास्त्रविचक्षणैः । भारत्याः श्लक्ष्णया सर्वान्मुनीन्प्रह्लादयन्निव ॥४४
सर्ग-वर्णनम् ] [ ३७
पुराणज्ञाः सुमनसः पुराणाश्रययुक्तया ।
पुराणनियता विप्राः कथामकथयद्विभुः ॥४५
एतत्सर्वं यथावृत्तमाख्यानं द्विजसत्तमाः ।
ऋषीणां च परं चैतल्लोकतत्त्वमनुत्तमम् ॥४६
ब्रह्मणा यत्पुरा प्रोक्तं पुराणं ज्ञानमुत्तमम् ।
देवतानामृषीणां च सर्वपापप्रमोचनम् ॥४७
विस्तरेणानुपूर्व्या च तस्य वक्ष्याम्यनुक्रमम् ॥४८
जिसका शरीरों का धारण को पूर्यमाण होता हुआ करता है । आकाश जिसकी योनि है वह द्विगुण है और शब्द तथा स्पर्श समन्वित ।४३। शब्द शास्त्र अर्थात् व्याकरण के विद्वानों के द्वारा वाग्घोरणि कही गयी है । परम नम्र और मधुर वाणी से सभी मुनिगणों को आनन्दित करते हुए ही ऐसा किया था ।४४। सुन्दर मन वाले जो पुराणों के ज्ञाता थे उन्होंने पुराणों के समाश्रय के युक्त होकर जो पुराणों के प्रवचन करने में नियत थे उनसे विभु ने कहा कही थी ।४५। हे द्विजश्रेष्ठो ! यह सब आख्यान जैसा भी हुआ था । ऋषियों का यह परम सर्वोत्तम लोक तत्त्व है ।४६। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने उत्तम ज्ञान पुराण कहा था वह देवताओं से और ऋषियों के सभी प्रकार के पापों का मोचन करने वाला है अब पूर्ण विस्तार से और आनुपूर्वी अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम से मैं अनुक्रम से बतलाऊंगा ।४७-४८।
सर्ग-वर्णनम्
शृणु तेषां कथां दिव्यां सर्वपापप्रमोचिनीम् ।
कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसंमताम् ॥१
य इमां धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः ।
स्ववंशं धारणं कृत्वा स्वर्गलोके महीयते ॥२
विश्वतारा या च पञ्च यथावत्तं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्यमानं निबोधार्थं पूर्वेषां कीर्तिवर्धनम् ॥३
३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुघ्नमेव च । कीर्त्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् ॥४ यस्मात्कल्पायते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः । तस्मै हिरण्यगर्भाय पुरुषायेश्वराय च ॥५ अजाय प्रथमायैव वरिष्ठाय प्रजासृजे । ब्रह्मणे लोकतन्त्राय नमस्कृत्य स्वयंभुवे ॥६ महदाद्यं विशेषांतं सवैरूप्यं सलक्षणम् । पञ्चप्रमाणं षट्श्रांतः पुरुषाधिष्ठितं च यत् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—समस्त पापों का प्रमोचन कर देने वाली उनकी परम दिव्य कथा का आप अब श्रवण कीजिए जो कि मेरे द्वारा कही जा रही है। यह कथा बहुत ही विचित्र है और श्रुति के संमत है। इसका प्रचुर अर्थ भी है ।१। जो पुरुष इस कथा को नित्य धारण किया करता है और बारम्बार इसका श्रवण किया करता है वह अपने वंश को धारण करके अन्त में स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ।२। जिस प्रकार से हुआ है और जैसा सुना गया है जो यह पंच विश्व तारा है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए कीर्त्तित किया हुआ यह पूर्व में होने बालों की कीर्त्ति का बढ़ाने वाला है ।३। यह परम धन्यपण देने वाला —आयु के बढ़ाने वाला—स्वर्गलोक प्राप्त कराने वाला और शत्रुओं का नाशक है । स्थिर कीर्ति से युक्त-पुण्य कर्मों वाले सबका कीर्त्तन करना इन उपर्युक्त सभी के देने वाला होता है ।४। जिसके कल्प भी कल्प का रूप धारण किया करता है और सम्पूर्ण शुचि के लिए भी शुचि है उन पुरुषों के स्वामी हिरण्यगर्भ के लिए जो अजन्मा है—सबसे प्रथम है—सबमें परमश्रेष्ठ है और प्रजाओं का सृजन करने वाले हैं उन लोक तन्त्र स्वयम्भू ब्रह्माजी के लिए नमस्कार है ।५-६। जो महत् का आदि में होने वाला है, जो विशेष के अन्त वाला है जो वैरुप्य से युक्त है-जो लक्षण वाला है—जो पांच प्रणामों वाला है-जो षट् श्रान्त है और पुरुषाधिष्ठित है ।७।
आसंयमात्प्रवक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् । अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् ॥८ प्रधानं प्रकृतिं चैव यमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ।
सर्ग वर्णन ] [ ३६
गन्धरूपरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम् ॥६ जगद्योनिम्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम् । विग्रहं सर्वभूतानामव्यक्तमभवत्किल ॥१० अनाद्यंतमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवोप्ययम् । असांप्रतिकमज्ञेयं ब्रह्म यत्सदसत्परम् ॥११ तस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तमासीत्तमोमयम् । गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभातं तमोमयम् ॥१२ सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्राज्ञाधिष्ठितस्य वै । गुणभावादूभासमाने महातत्वं वभूव ह ॥१३ सूक्ष्म स तु महानग्रे अव्यक्तेन समावृतः । सत्वोद्रेको महानग्रे सत्वमात्रप्रकाशकः ॥१४
इस परमोत्तम भूतों के सर्ग को संयम से आरम्भ करने मैं बतला- ऊँगा । जो अव्यक्त कारण है वह नित्य है और उसको स्वरूप सत् एवं जगत् दोनों ही प्रकार का है ।८। तत्त्वों का चिन्तन करने वाले विचारक लोग उस त्र्यम्बक को प्रधान तथा प्रकृति कहा करते हैं जो कि गन्ध-स्पर्श और रस से रहित है तथा शब्द से भी विवर्जित हैं ।६। इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति स्थान, महाभूत सनातन परब्रह्म तथा समस्त भूतों का विग्रह निश्चित रूप से अव्यक्त हो गया था ।१०। आदि और अन्त से रहित अजन्मा, सूक्ष्म रूप वाला सत्त्व-रज और तम-इन तीन गुणों से युक्त अर्थात् त्रिगुणात्मक, सबका प्रभाव भी यह है जो असाम्प्रतिक, न जानने के योग्य, सत् और असत् स्वरूप वाला, पर ब्रह्म है । जो सभी भूतों का निग्रह है वही अव्यक्त हो गया है । ।११। उसी को आत्मा से यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है तम से परिपूर्ण है । उस समय में उस गुणों (तीनों गुणों) के साम्य होने पर यह तमोमय विभात नहीं होता है ।१२। जब सृजन का समय होता है उस काल में क्षेत्र के ज्ञाता के द्वारा अधिष्ठित प्रधान के गुणों के भय से भासमान होने पर यह महा- तत्व होगया था ।१३। आगे वह सूक्ष्म रूप वाला महान् अव्यक्त से समावृत था । सत्त्व गुण की अधिकता से युक्त महान् केवल सत्त्व का ही प्रकाश करने वाला था ।१४।
सत्वान्महान्स विज्ञेय एकस्तत्कारणः स्मृतः ।
४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
लिंगमात्रं समुत्पन्नं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं महत् ॥१५ संकल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम् । महासृष्टिं च कुरुते वीतमानः सिसृक्षया ॥१६ धर्मादीनि च भूतानि लोवतत्वार्थहेतवः । मनो महात्मनि ब्रह्म दुर्बुद्धिख्यातिरीश्वरात् ॥१७ प्रज्ञासंधिश्च सर्वस्थं संख्यायतनरश्मिभिः । मनुते सर्वभूतानां तस्माच्चेष्टफलो विभुः ॥१८ भोक्ता त्राता विभक्तात्मा वर्त्तंनं मन उच्यते । तत्वानां संग्रहे यस्मान्महांश्च परिमाणतः ॥१९ शेषेभ्यो गुणतत्वेभ्यो महानिव तनुः स्मृतः । विभक्तिमानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि वा ॥२० पुरुषो भोगसंबंधात्तेन चासौ संति स्मृतः । वृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च भावानांमखिलाश्रयात् ॥२१
सत्र से वह महान् एक जानने के योग्य है। और एक ही कारण कहा गया है क्षेत्रज्ञ से अधिष्ठित महत् केवल लिङ्ग ही समुत्पन्न हुआ था ।१५। उसकी छै: प्रकार की वृत्ति बतायी गयी है—एक तो सङ्कल्प और दूसरी वृत्ति अध्यवसाय है । सृजन करने की इच्छा से वीतमान वह इस महती सृष्टि को किया करता है ।१६। और धर्म आदि भूत लोकतत्वार्थ के हेतु हैं । महान् आत्मा में मन ही ब्रह्म है और ईश्वर से इसकी दुर्बुद्धि यह ख्याति है ।१७। संख्यायत रश्मियों से सब भूतों की प्रज्ञा सन्धि सर्वस्व मानता है । इस कारण से विभु चेष्टा के वाला होता है ।१८। भोक्ता (भोगने वाला) परित्राण करने वाला-विभक्त आत्मा वाला बरतने वाला जो है वही मन कहा जाता है । जिसमें तत्वों के संग्रह में है और परिणाम से महान् है ।१९। शेष जो गुणों के तत्व हैं उनके महान की ही भाँति तनु कहा गया है । विभक्ति स युक्त को मानता है अथवा विभाग को मानता है ।२०। यह पुरुष उसके द्वारा अर्थात् शरीर के द्वारा भोगों का सम्बन्ध होने से सत् में कहा गया है । वृहत् होने से और वृंहणत्व होने से और भावों का पूर्ण आश्रय होने से पैदा होता है ।२१।
सर्ग वर्णन ] [ ४१
यस्माद्बृ ंहयत भावान् ब्रह्मा तेन निरुच्यते । आपूरयति यस्माच्च सर्वान् देहाननुग्रहैः ॥२२ बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान्पृथक् पृथक् । तस्मिंस्तु कार्यकारणं संसिद्धं ब्रह्मणः पुरा ॥२३ प्राकृतं देवि वर्तं मां क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंमितः । स वै शरीरी प्रथमः पुरा पुरुष उच्यते ॥२४ आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्त्तिनाम् ॥२५ हिरण्यगर्भः सोऽण्डेऽस्मिन्प्रादुर्भूतश्चतुर्मुखः । सर्गे च प्रतिसर्गे च क्षेत्रज्ञो ब्रह्म संमितः ॥२६ करणैः सह पृच्छते प्रत्याहारैस्त्यजंति च । भजंते च पुनर्देहांस्ते समाहारसंधिषु ॥२७ हिरण्मयस्तु यो मेरुस्तस्योद्धर्तुं र्महात्मनः । गर्त्तोदकं संबुदास्तु हरेयुश्चापि पञ्चताः ॥२८
जिससे भावों का बृंहण करना है उसी से ब्रह्मा—इस नाम से कहा जाया करता है । और जिस कारण से समस्त देहों को अनुग्रहों के द्वारा आपूरित करता है ।२२। यहाँ पर पुरुष सब भावों को पृथक् पृथक् जानता है । उसमें तो पहले ब्रह्म का कार्य और करण से सिद्ध हुआ है ।२३। हे देवि ! मुझको प्राकृत समझकर बतलाया करो । जो क्षेत्रज्ञ है वह ब्रह्म से संमित है । वह शरीर धारी निश्चय ही पहिले पुरुष कहा जाया करता है ।२४। ब्रह्मा के आगे समवर्ती भूतों का वह आदि कर्त्ता है ।२५। वह हिरण्यगर्भ इस अण्ड में चार मुखों वाला प्रादुर्भूत हुआ था । सर्ग और प्रतिसर्ग में क्षेत्रज्ञ ब्रह्म संमित है ।२६। करणों के साथ पूछते हैं और प्रत्याहारों से त्याग करते और वे पुनः समाहार सन्धियों में देहों का सेवन करते हैं ।२७। हिरण्मय जो मेरु गिरि है उस महान् आत्मा वाले के गर्त्तोदक का उद्धार करने के लिये संबुद पञ्जला का भी हरण करते हैं ।२८।
यस्मिन्नंड इमे लोकाः सप्त वै संप्रतिष्ठिताः । पृथिवी सप्तभिर्द्दीपैः समुद्रैः सह सप्तभिः ॥२९ पर्वतैः सुमहद्भिश्च नदीभिश्च सहस्रशः । अन्तः स्थस्य त्विमे लोका अंतर्विश्वमिदं जगत् ॥३०