संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भृगु का शाप प्राप्त किया था और भृगु ने शुक्र की दिव्य माता को उठाया था ॥१२७॥
देवानां च ऋषीणां च संक्रमा द्वादशाहृताः । नारसिंहप्रभृतयः कीर्त्यन्ते पापनाशनाः ॥१२८ शुक्रेणाराधनं स्थाणोर्घोरेण तपसा तथा । वरप्रदानकृत्तं न यत्र शर्वंस्तज्वः कृतः ॥१२६ अनन्तरं च निर्दिष्टं देवासुरविचेष्टितम् । जयंत्या सह शक्रेण यत्र शुक्रो महात्ममति ॥१३० असुरान्मोहयामास शक्ररूपेण बुद्धिमान् । वृहस्पति तं शुक्रं शशाप स महाद्युतिः ॥१३१ उक्तं च विष्णोर्माहात्म्यं विष्णोर्जन्मनि शब्द्यते । तुर्वसुश्चात्र दौहित्रो यवीयान्यो यदोरभूत् ॥१३२ अनुद्रुह्यादयः सर्वे तथा तन्तनया नृपाः । अनुवंश्या महात्मानस्तेषां पार्थिवसत्तमाः ॥१३३
देवों के और ऋषियों के संक्रम से द्वादश आहूत हुए थे । नारसिंह प्रभृति पापों के नाश करने वाले कीर्तित किये गये हैं ।१२८। अत्यन्त घोर तप के द्वारा शुक्र देव ने भगवान् शिव की आराधना की थी । फिर उसने वर के प्रदान करने वाले भगवान् शिव की स्तुति की थी ।१२९। इसके उपरान्त देवों और असुरों की विशेष चेष्टा का निर्देश किया गया है जहाँ पर महात्मा में शुक्र ने जयन्ती के साथ इन्द्र ने किया था ।१३०। बुद्धिमान् ने इन्द्र के रूप से असुरों को मोहित कर दिया था । और महती द्युति वाले वृहस्पति ने शुक्राचार्य को शाप दे दिया था ।१३१। भगवान् विष्णु के जन्म में विष्णु का माहात्म्य कहा जाता है । वहाँ पर तुर्वसु दौहित्र था जो यदु का सब से छोटा हुआ था ।१३२। अनुद्रुह्य आदि सब नृप उसके पुत्र हुए थे । उसके महात्मा श्रेष्ठ नृप उनके पीछे वंश में होने वाले हुए थे ।१३३।
कीर्त्यन्ते यत्र कात्स्न्र्येन भूरिद्रविणतेजसः । आतिथ्यस्य तु विप्रर्षेः सप्तधा धर्मसंश्रयात् ॥१३४ बार्हस्पत्यं सूरिभिश्च यत्र शापमुपावृतम् ।