संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृत्य-समुद्देश्य ] [ २५
हरवंशयशः स्पर्शः शांतनोर्वीर्य्यशब्दनम् ॥१३५ भविष्यतां तथा राज्ञामुपसंहारशब्दनम् । अनागतानां संघानां प्रभूणां चोपवर्णनम् ॥१३६ भौत्यस्यांते कलियुगे क्षीणे संहारवर्णनम् । नैमित्तिकाः प्राकृतिका यथैवात्यंतिकाः स्मृताः ॥१३७ विविधः सर्वभूतानां कीर्त्यते प्रतिसंचरः । अनावृष्टिर्भास्करस्य घोरः संवर्त्तकानलः ॥१३८ सांख्ये लक्षणमुद्दिष्टं ततो ब्रह्म विशेषतः । ध्रुवादीनां च लोकानां सप्तानां चोपवर्णनम् ॥१३९ अपारार्द्धापरैश्चैव लक्षणं परिकीर्त्यते । ब्रह्माणो योजनाग्रेण परिमाणविनिर्णयः ॥१४० कीर्त्यन्ते चात्र निरयाः पापानां रौरवादयः । सर्वेषां चैव सत्त्वानां परिणामविनिर्णयः ॥१४१
जहाँ पर पूर्णरूप से अधिक द्रव्य और तेज वाले विप्रर्षि के धर्म के संश्रय से आतिथ्य का कीर्त्तन किया जाता है ।१३४। जहाँ पर सूरियों ने वृहस्पति के शाप को प्राप्त किया था। हर वंश के यश का स्पर्श है और राजा शन्तनु के वीर्य पराक्रम का कथन है ।१३५। आगे भविष्य में होने वाले राजाओं के उपसंहार का कथन है। जो अनागत संघ हैं और प्रभु हैं उनका उपवर्णन है ।१३६। भोत्य के अन्त में कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार का वर्णन है। जो भी किसी निमित्त के कारण होने वाले थे, प्राकृतिक थे और जो आत्यन्तिक कहे गये हैं ।१३७। समस्त प्राणियों का अनेक प्रकार का प्रति सञ्चरण था उसका कीर्त्तन किया जाता है। भगवान् भास्कर का दृष्टि में न आने वाला परम घोर संवर्त्तक अनल था ।१३८। सांख्य में लक्षण उद्दिष्ट है इसके बाद विशेष रूप से ब्रह्म का वर्णन है। ध्रुव आदि सात लोकों का उप वर्णन है ।१३९। अपराद्धं परों के द्वारा लक्षण का परिकीर्त्तन किया जाता है। योजनाग्र से ब्रह्म के परिमाण का विशेष निर्णय किया गया है ।१४०। रौरव आदि नरकों का तथा सभी प्राणियों के पापों के निर्णय का वर्णन किया गया है ।१४१।