भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ब्रह्मणः प्रतिसंसर्गात्सर्वसंसारवर्णनम्।
गतिरूर्ध्वमधश्चोक्ता धर्माधर्मसमाश्रया ॥१४२
कल्पे कल्पे च भूतानां महतामपि संक्षयम्।
असंख्यया च दुःखानि ब्रह्मणश्चाप्यनित्यता ॥१४३
दौरात्म्यं चैव भोगानां संहारस्य च कष्टता।
दुर्लभत्वं च मोक्षस्य वैराग्याद्दोषदर्शनात् ॥१४४
व्यक्ताव्यक्तं परित्यज्य सत्त्वं ब्रह्मणि संस्थितम्।
नानात्वदर्शनाच्छुद्धस्तवस्तत्र निवर्त्तते ॥१४५
ततस्तापत्रयाद् भीतो रूपार्थो हि निरंजनः।
आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य न विभेति कुश्चन ॥१४६
कीर्त्यते च पुनः सर्गो ब्रह्मणोऽन्यस्य पूर्ववत्।
कीर्त्यते जगतश्चात्र सर्गप्रलयविक्रियाः ॥१४७

ब्रह्मा के प्रति संसर्ग से सब संसार का वर्णन होता है। धर्म और अधर्म के समाश्रय वाली ऊर्ध्वगति और अधोगति कही गयी है ।१४२। कल्प कल्प में महान् भूतों का भी संक्षय होता है और असंख्य दुःख होते हैं तथा ब्रह्मा की भी नित्यता नहीं है अर्थात् ब्रह्मा का भी विनाश होता है ।१४३। भोगों की दुरात्मता है अर्थात् भोगी का बुरा प्रभाव होता है और संहार के समय में बड़ा कष्ट होता है। दोषों के देखने से जो वैराग्य उत्पन्न होता है वह बहुत कठिन है और मोक्ष होना महान दुर्लभ है ।१४४। व्यक्त और अव्यक्त का पूर्ण सत्व ब्रह्म में संस्थित हो जाता है। नाना रूपता के दर्शन से वहाँ पर शुद्ध स्तव निवृत्त हो जाया करता है ।१४५। इसके अनन्तर तीनों (आधिभौतिक-आधिदैविक आध्यात्मिक) तापों से भयभीत होता हुआ रूपार्थ निरञ्जन ब्रह्म के आनन्द को प्राप्त करके फिर कही से भी नहीं डरता है ।१४६। फिर पूर्व की ही भाँति अन्य ब्रह्मा के सर्ग का कीर्त्तन किया जाता है। इसमें जगत की सृष्टि-प्रलय और विक्रिया का कीर्त्तन किया जाता है ।१४७।

प्रवृत्तयश्च भूतानां प्रसूतानां फलानि च।
कीर्त्यते ऋषिवर्गस्य सर्गः पापप्रणाशनः ॥१४८