भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रादुर्भावो वसिष्ठस्य शक्तोर्जन्म तथैव च । सौदासास्थिग्रहश्चास्य विश्वामित्रकृतेन तु ॥१४९ पराशरस्य चोत्पत्तिरदृश्यन्त्यां तथा विभोः । संजज्ञे पितृकन्यायां व्यासश्चापि महामुनिः ॥१५० शुकस्य च तथा जन्म सह पुत्रस्य धीमतः । पराशरस्य प्रद्वेषो विश्वामित्रऋषि प्रति ॥१५१ वसिष्ठसंभृतिश्चाग्नेर्विश्वामित्रजिघांसया । देवेन विधिना विप्र विश्वामित्रहितैषिणा ॥१५२ संतानहेतोर्विभुना गीर्णस्कंधेन धीमता । एकं वेदं चतुष्पादं चतुर्द्धा पुनरीश्वरः ॥१५३ तथा बिभेद भगवान् व्यासः शार्वाद्वनुग्रहात् । तस्य शिष्यप्रशिष्यैश्च शाखा वेदायुताः कृताः ॥१५४

भूतगणों की प्रवृत्तियां और प्रसूत भूतों के फल कहे जाते हैं । ऋषियों के समुदाय के पापों का नाश कर देने वाला सर्ग कहा जाता है । ।१४८। वसिष्ठ मुनि का प्रादुर्भाव और शक्ति का जन्म उसी प्रकार से बतलाया गया है । विश्वामित्र के द्वारा किया हुआ इस सौदान की अस्थियों का ग्रहण कहा गया है ।१४९। अदृश्यन्ती में विभु पराशर की उत्पत्ति कही गयी है । अपने पिता की कन्या के उदर से महामुनि व्यासदेव ने जन्म ग्रहण किया था ।१५०। धीमान् सह पुत्र शुकदेव मुनि का जन्म कहा गया है । पराशर ऋषि का विश्वामित्र मुनि को प्रति प्रकृष्ट विद्वेष होता है ।१५१। विश्वामित्र मुनि की हिंसा की इच्छा से अग्नि की वसिष्ठ संभृति का कथन है । विप्र विश्वामित्र के हित की इच्छा वाले देव विधाता ने ऐसा किया था ।१५२। विभु बुद्धिमान् गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और फिर ईश्वर ने चार प्रकार से किया था ।१५३। भगवान् शिव के अनुग्रह से भगवान् व्यासदेव ने उसी भाँति भेद किया था । उस वेद के शिष्यों और प्रविष्टों ने वेद की अयुत शाखायें की थी ।१५४।

प्रयोगे प्रह्वला नैव यथा दृष्टः स्वयंभुवा । पृष्टवन्तो विशिष्टास्ते मुनयो धर्मकांक्षिणः ॥१५५