संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देशं पुण्यमभीप्सतो विभुना तद्धितेषिणा ।
सुनाभं दिव्यरूपामं सप्तांगं शुभशंसनम् ॥१५६
आनौपम्यमिदं चक्रं वर्त्तमानमतंद्रिताः ।
पृष्ठतो यात नियतास्ततः प्राप्स्यथ पाटितम् ॥१५७
गच्छतस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्विशीर्यते ।
पुण्यः स देशो मंतव्यः प्रत्युवाच तदा प्रभुः ॥१५८
उक्त्वा चैवमृषीन्सर्वानदृश्यत्वमुपागमत् ।
गंगा गर्भ यवाहारा नैमिषेयास्तथैव च ॥१५९
ईशिरे चैव सत्रेथ मुनयो नैमिषे तदा ॥१६०
मृते शरद्वति तथा तस्य चोत्थापनं कृतम् ।
ऋषयो नैमिषेयाश्च दयया परया युताः ॥१६१
प्रयोग में प्रह्वला नहीं है जैसा कि स्वयम्भू ने देखा है । धर्म की आकांक्षा रखने वाले उन विशिष्ट मुनियों ने पूछा था ।१५५। जो कि पुण्य देश की इच्छा रखने वाले थे और विभु उनके हित की इच्छा रखने वाले थे । सुनाम-दिव्यरूप और आभा से युक्त-सात अङ्गों वाला और शुभ को बताने वाला था ।१५६। यह उपमा से रहित वर्तमान चक्र था । पीछे से अतन्द्रित होकर नियत वे गमन करें फिर पाटित को प्राप्त हो जायेंगे ।१५७। गमन करते हुए उस चक्र की जहाँ पर ही नेमि विशीर्ण हो जाती है—उस समय में प्रभु ने यही उत्तर दिया था कि उसी देश को पुण्यमत मानना चाहिए ।१५७। इस रीति से उन सब ऋषियों से कहकर वे अदृश्य हो गये थे । गङ्गा के गर्भ में वे नैमिषेय यवों का आहार करने वाले रहे थे ।१५९। उस समय में नैमिष में मुनियों ने सब के द्वारा उपासना की थी ।१६०। शरद्वान् के समाप्त हो जाने पर उसका उत्पादन किया था । वे नैमिषेय ऋषि-गत परमाधिक दया से समन्वित थे ।१६१।
निःसीमां गामिमां कृत्वा कृष्णं राजानमाहरत् ।
प्रीतिं चैव कृतातिथ्यं राजानं विधिवत्तदा ॥१६२
अन्तः सर्गगतः क्रूरः स्वर्भानुरसुरो हरन् ।
द्रुते राजनि राजानु मद्रते मुनयस्ततः ॥१६३