भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कृत्य-समुद्देश्य ] [ २९

गंधर्वरक्षितं दृष्ट्वा कलापग्रामकेतनम् । सन्निपातः पुनस्तस्य तथा यज्ञे महर्षिभिः ॥१६४ दृष्ट्वा हिरण्मयं सर्वं विवादस्तस्य तैरभूत् । तदा वै नैमिषेयानां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥१६५ तथा विवदमानैश्च यदुः संस्थापितश्च तैः । जनयित्वा त्वरण्यं वै यदुपुत्रमथायुतम् ॥१६६ समापयित्वा तत्सत्रं वायुं ते पर्युपासत । इति कृत्यसमुद्देशः पुराणांशोपवर्णितः ॥१६७ अनेनानुक्रमेणैव पुराणं संप्रकाशते । सुखमर्थः समासेन महानप्युपलक्ष्यते ॥१६८

इस भूमि को सीमा से रहित करके उन्होंने राजा कृष्ण का आहरण किया था। उस समय में उन्होंने विधि के साथ प्रीति को प्रदर्शित किया था और उनका भली-भाँति आतिथ्य भी किया था। १६२। अन्दर से क्रूर और सब जगह जाने वाले स्वर्भानु असुर ने हरण किया था। राजा के शीघ्र जाने पर मुनि राजा के ही पीछे मुदित हो गये थे। १६३। कलाप ग्राम केतन को गन्धर्वों के द्वारा सुरक्षित देखकर फिर उसका सन्निपात हुआ था। उसी प्रकार से यज्ञ में महर्षियों ने देखा था। १६४। वहाँ पर सभी कुछ सुवर्णमय उन्होंने देखा था और उनका उसके साथ विवाद हुआ था। उस अवसर पर नैमिषेयों का वह सत्र (यज्ञ) बारह वर्ष का था उस यज्ञ में ।१६५। उस भाँति परस्पर में विवाद करने वाले उन्होंने यदु को संस्थापित किया था। इसके अनंतर अयुत यदु के पुत्रों वाले उस अरण्य को बचा दिया था। १६६। उस यज्ञ की परिसमाप्ति करके उन्होंने वासुदेव की उपासना की थी। यह कृत्यों का समुद्देश है जो पुराण के इस अंश में उपवर्णित किया गया है। ।१६७। इसी अनुक्रम से यह पुराण संप्रकाशित होता है समास से सुख अर्थ होता है और इससे महान् भी उपलक्षित होता है। १६८।

तस्मात्समासमुद्दिश्य वक्ष्यामि तव विस्तरम् । पादमाद्यमिदं सम्यग् योऽधीते विजितेन्द्रियः ॥१६९ तेनाधीतं पुराणं स्यात्सर्वं नास्त्यत्र संशयः । यो विद्याच्चतुरो वेदान् सांगोपनिषद्विजः ॥१७०