भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कुशवज्रैर्बिनिष्पिष्टः स राजा व्यजहात्तनुम्। और्वशेयैस्ततस्तस्य युद्धं चक्रे नृपो भुवि ॥२३ नहुषस्य महात्मानं पितरं यं प्रचक्षते। स तेष्ववभृथेष्वेव धर्म्मशीलो महीपतिः ॥२४ आयुरार्यभवायाग्र्यमस्मिन् सत्रे नरोत्तमः। शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा ॥२५ सत्रमारेभिरे कत्तुं पृथ्वीवत्सात्ममूर्तयः। बभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्यं महात्मनाम् ॥२६ विश्वं सिसृक्षमाणानां पुरा विश्वसृजामिव। वैखानसैः प्रियसखैर्वालखिल्यैर्मरीचिभिः ॥२७ अजैश्च मुनिभिर्जातं सूर्यवैश्वानरप्रभः। पितृदेवाप्सरः सिद्धैर्गंधर्वोरगचारणैः ॥२८

उन मनीषियों ने बहुत क्रोधित होते हुए कुश के वज्रों से उसका हनन किया था क्योंकि वे मुनिगण तपश्चर्या में निष्ठा रखने वाले और दैव के द्वारा प्रेरित थे ।२२। कुशाओं के वज्रों से पिसकर उस राजा ने अपना शरीर त्याग दिया था। उसके अनन्तर भूमि में उसके उर्वशी के पुत्रों के साथ नृप ने युद्ध किया था ।२३। नहुष के जिसको महात्मा पिता कहते हैं। उन अवभृथों में ही वह महीपति बहुत ही धर्मशील था ।२४। इस सत्र में वह नरश्रेष्ठ आयुराय और जन्म से बहुत श्रेष्ठ था। उस समय में ब्रह्म वेत्ताओं ने राजा को शान्त किया था ।२५। आत्म मूर्ति वाले उन्होंने पृथ्वी के समान सत्र करने का आरम्भ कर दिया था उनके सत्र में उन महात्माओं का ब्रह्मचर्य हुआ था ।२६। विश्व के सृजन करने की इच्छा वाले का प्राचीनकाल में विश्व के स्रष्टाओं की भांति वैखानस-प्रियसखा-बालखिल्य-मरीचियों-अज और मुनिगण-पितृगण-देव-अप्सरा-सिद्ध-गन्धर्व-उरग और चारण के साथ वह सूर्य तथा वैश्वानर के समान प्रभा वाला हुआ था ।२७-२८।

भारतैः शुशुभे राजा देवैरिन्द्रसमो यथा। स्तोत्रशस्त्रैर्गृहैर्देवान्पितॄन्पिश्यद्य कर्मभिः ॥२९ आनर्चुःस्म यथाजाति गंधर्वादीन् यथाविधि।