संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३३
उर्वशी चकमे तं च देवदूतप्रचोदिता । आजहार च तत्सत्रमुर्वश्या सह संगतः ॥१६ तस्मिन्नरपतौ सत्रे नैमिषीयाः प्रचक्रिरे । यं गर्भं सुषुवे गङ्गा पावकाद्दीप्ततेजसम् ॥१७ तत्तुल्यं पर्वते न्यस्तं हिरण्यं समपद्यत । हिरण्मयं ततश्चक्रे यज्ञवाटं महात्मनाम् ॥१८ विश्वकर्मा स्वयं देवो भावनो लोकभावनः । स प्रविश्य ततः सत्रं तेषाममिततेजसाम् ॥१९ ऐडः पुरूरवा भेजे तं देशं मृगयां चरन् । तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं यज्ञवाटं हिरण्मयम् ॥२० लोभेन हतविज्ञानस्तदादातुमुपाक्रमत् । नैमिषेयास्ततस्तस्य चुक्रुधुर्नृपतिं भृशम् ॥२१
अट्ठारह समुद्र के द्वीपों का अशन करते हुए भी पुरूरवा लोभ से रत्नों से सन्तुष्ट न हुआ था—ऐसा हमने सुना है ।१५। देवदूतों के द्वारा प्रेरित हुई उर्वशी ने उसको अपना पति बनाने की कामना की थी । उर्वशी के साथ संगत होकर उसने उस सत्र का आहरण किया था ।१६। उस नर पति के होने पर नैमिषीयों ने सत्र किया था । गंगा ने पावक से दीप्त तेज वाले जिस गर्भ का प्रसव किया था ।१७। उसके तुल्य पर्वत में न्यस्त किया हुआ हिरण्य (सुवर्ण) हो गया था । इसके अनन्तर उन महात्माओं को हिरण्मय कर दिया था ।१८। लोकों को प्रसन्न करने वाले परम भावुक विश्वकर्मा स्वयं देव था । उन अपरिमित तेज वालों के सत्र में फिर उस विश्वकर्मा ने प्रवेश किया था । ऐड पुरूरवा ने शिकार करते हुए उस देश का सेवन किया था । उसने जब देखा था कि वह यज्ञ का स्थल एकदम सुवर्णमय है तो उसको महान् आश्चर्य हुआ था ।१९-२०। लोभ के कारण उस राजा का सब ज्ञान नष्ट हो गया था और उसने उसको स्वयं ग्रहण करने का उपक्रम किया था । तब तो जो नैमिषीय मुनिगण वहाँ पर थे वे उस राजा पर बहुत क्रुद्ध हुए थे ।२१।
निजघ्नुश्चापि तं क्रुद्धाः कुशवज्रैर्मनीषिणः । तपोनिष्ठाश्च राजानं मुनयो देवचोदिताः ॥२२