संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कर्मणा तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् ॥८ यत्र सा गोमती पुण्या सिद्धचारणसेविता । रोहिणी ससुता तत्र गोमती साभवत् क्षणात् ॥६ शक्तिर्ज्येष्ठा समभवद्वसिष्ठस्य महात्मनः । अरुन्धत्याः सुतायात्रादानमुत्तमतेजसः ॥१० कल्माषपादो नृपतिर्यत्र शक्रश्च शक्तिना । यत्र वैरं समभवद्विश्वामित्रवसिष्ठयोः ॥११ अदृश्यंत्यां समभवन्मुनिर्यत्र पराशरः । पराभवो वसिष्ठस्य यस्य ज्ञाने ह्यवर्त्तयत् ॥१२ तत्र ते मेनिरे शैलं नैमिषे ब्रह्मवादिनः । नैमिषं जज्ञिरे यस्मान्नैमिषीयास्ततः स्मृताः ॥१३ तत्सत्रमभवत्तेषां समा द्वादश धीमताम् । पुरूरवसि विक्रांते प्रशासति वसुन्धराम् ॥१४
भ्रमण करते हुए धर्म चक्र की नेमि जहां पर शीर्ण हो गयी थी । उस कर्म से मुनियों के द्वारा समर्चित नैमिष विख्यात हुआ था ।८। जहाँ परम पुण्यमयी गोमती नदी है जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सदा सेवित रहा करती है । वहाँ पर ससुता रोहिणी एक ही क्षणमात्र में वह गोमती हो गयी थी ।६। महात्मा वसिष्ठ की शक्ति ज्येष्ठा हुई थी जो उत्तम तेज वाली अरुन्धती की सुता का यात्रा दान था ।१०। कल्माषपाद नृप और शक्ति के सहित इन्द्रदेव थे जहां पर विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि का वैर हुआ था ।११। जिस स्थल पर अदृश्यन्ती में पराशर मुनि ने जन्म ग्रहण किया था । जिसके ज्ञान में वसिष्ठ मुनि का पराभव हुआ था ।१२। वहां पर उन ब्रह्म वादियों ने उस शैल को नैमिष माना था । क्योंकि वहां पर नैमिष यजन किया था अतएव तभी से वे सब नैमिष कहे गये थे ।१३। वह सत्र उन बुद्धिमानों का द्वादश वर्षों तक हुआ था जबकि विक्रमी पुरूरवा नृप इस वसुन्धरा पर शासन कर रहा था ।१४।
अष्टादश समुद्रस्य द्वीपानश्नन् पुरूरवाः । तुतोष नैव रत्नानां लोभादिति हि नः श्रुतम् ॥१५