भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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नैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३१

कियन्तं चैव तत्कालं कथं च समवर्त्तत ।
आचचक्षे पुराणं च कथं तत्सप्रभंजनः ॥२
आचख्यो विस्तरेणैव परं कौतूहलं हि नः ।
इति संचोदितः सूतः प्रत्युवाच शुभं वचः ॥३
शृणुध्वं यत्र ते धीरा मेनिरे सत्रमुत्तमम् ।
यावन्तं चाभवत्कालं यथा च समवर्तत ॥४
सिसृक्षमाणो विश्वं हि यजते विसृजत्पुरा ।
सत्रं हि तेऽतिपुण्यं च सहस्रपरिवत्सरान् ॥५
तपोगृहपतेर्यत्र ब्रह्मा चैवाभवत्स्वयम् ।
इडाया यत्र पत्नीत्वं शामित्रं यत्र बुद्धिमान् ॥६
मृत्युश्चके महातेजास्तस्मिन्सत्रे महात्मनाम् ।
विबुधाश्चोषिरे तत्र सहस्रपरिवत्सरान् ॥७

तपश्चर्या के धन वाले उन ऋषियों ने श्रीसूतजी से फिर कहा था कि उन अद्भुत कर्मों के करने वालों का वह यज्ञ कहाँ पर हुआ था ।१। वह समय जिसमें यज्ञ का यजन हुआ था कितना था और वह किस प्रकार से सम्पन्न हुआ था ? । वायुदेव ने पुराण की किस रीति से कहा था ? ।२। उन्होंने बहुत विस्तार के साथ इस पुराण का कथन किया था—इसमें हम सबके हृदय में बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है । इस प्रकार से जब प्रेरित किया गया था तो श्री सूतजी ने परम शुभ वचन से उत्तर दिया था ।३। हे मुनियो ! आप लोग श्रवण कीजिए । जहाँ पर उन धीरों ने उस उत्तम सत्र को किया था । और जितने समय पर्यन्त वह वहाँ पर हुआ था और जिस रीति से हुआ था ।४। इस विशाल विश्व का सृजन करने की इच्छा वाला यजन करता है तब पहिले विसृजन करता है । यह सत्र अत्यधिक पुण्य मय है जो कि एक सहस्र परिवत्स्रों तक हुआ था ।५। जहाँ पर गृहपति का ब्रह्मा तप स्वयं ही हुआ था और जिसमें पत्नीत्व इडा का था और जहाँ बुद्धिमान् शामित्र था ।६। उन महान् आत्माओं वालों के यज्ञ में महातेज वाले मृत्यु ने सब किया था । सहस्र परिवत्स्रों तक वहाँ पर देवगणों ने निवास किया था ।७।

भ्रमतो धर्मचक्रस्य यत्र नेमिरशीर्यत ।