संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनैमिषाख्यान वर्णनम् ] [ ३५
आराधने स सस्मार ततः कर्मान्तरेषु च ॥३० जगुः सामानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । व्याजहुर्मुंनयो वाचं चित्राक्षरपदां शुभाम् ॥३१ मन्त्रादि तत्र विद्वांसो जजपुश्च परस्परम् । वितंडावचनैश्चैव निजघ्नुः प्रतिवादिनः ॥३२ ऋषयश्चैव विद्वांसः शब्दार्थन्यायकोविदाः । न तत्र हारितं किंचिद्विविशुर्न ह्मराक्षसाः ॥३३ नैव यज्ञहरा दैत्या नैव वाजमुखास्त्रिणः । प्रायश्चित्तं दरिद्रं च न तत्र समजायत । ३४ शक्तिप्रज्ञाक्रियायोगैर्विधिराशीष्वनुष्ठितः । एवं च ववृधे सत्रं द्वादशाब्दं मनीषिणाम् ॥३५
भारतीयों के द्वारा राजा देवगणों से इन्द्र के समान शोभायुक्त हुआ था। शस्त्रों-स्तोत्रों और गृहों से देवगणों का तथा पित्र्य कर्मों से पितृगणों का और गन्धर्व आदि का जाति के अनुसार विधिपूर्वक किया करते थे। उसने आराधना में और फिर अन्य कर्मों में स्मरण किया था ।२९-३०। गन्धर्वगण सामवेद के मन्त्रों का गान कर रहे थे परम शुभ और विचित्र अक्षरों और पदों से युक्त वाणी का उच्चारण कर रहे थे जो परम शुभ थी ।३१। वहाँ पर विद्वान् लोग परस्पर में मन्त्रों का जप करते थे। प्रतिवादी गण वितण्डावाद के वचनों के द्वारा निहनन कर रहे थे ।३२। ऋषिगण और शब्दार्थ तथा न्याय के ज्ञाता वहाँ पर थे। वहां पर कुछ भी हारित नहीं था और ब्रह्मराक्षसों ने प्रवेश किया था ।३३। दैत्यगण यज्ञ के हरण करने वाले नहीं थे और वाजमुख अस्त्र आदि थे। प्रायश्चित्त और दरिद्रता वहाँ पर नहीं थे ।३४। शक्ति-प्रजा और क्रिया के योगों से आशिषों में विधि अनुष्ठित की गयी थी। इस रीति से वह यज्ञ मनीषियों का बारह वर्ष पर्यन्त वृद्धि युक्त हुआ था ।३५।
ऋषीणां नैमिषीयाणां तदभूदिव वज्रिणः । वृद्धाश्च ऋत्विजो वीरा ज्योतिष्टोमान् पृथक्पृथक् ॥३६ चक्रिरे पृष्ठगमनाः सर्वानियुतदक्षिणान् ।