संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समाप्तयज्ञो यत्रास्ते वासुदेवं महाधिपम् ॥३७ पप्रच्छुरमितात्मानं भवद्बिभ्यर्थदहं द्विजः । प्रचोदितः स्ववंशार्थं स च तानब्रवीत्प्रभुः ॥३८ शिष्यः स्वयंभुवो देवः सर्वं प्रत्यक्षदृग्वशी । अणिमादिभिरष्टाभिः सूक्ष्मैरंगैः समन्वितः ॥३६ तिर्यग्वातादिभिर्वर्षैः सर्वांल्लोकान्बिभर्ति यः । सप्तस्कन्धा भूताः शाखाः सर्वतोयाजराजरात् ॥४० विषयैर्मरुतो यस्य संस्थिताः सप्तसप्तकाः । व्यूहत्रयाणां सूतानां कुर्वन् सत्रं महाबलः ॥४१ तेजसश्चाप्युयानां दधातीह शरीरिणः । प्राणाद्या वृत्तयः पञ्च धारणानां स्ववृत्तिभिः ॥४२ ऋषियों का जो कि नैमिषीय थे वह सत्र इन्द्र के समान हुआ था । वृद्धाश्च-ऋत्विज और वीर पीछे की ओर गमन करने वाले होते हुए ज्योति- ष्टोमों को पृथक् २ सबको अयुत दक्षिणा वाले कर रहे थे । जहाँ पर यज्ञ समाप्त हुआ था वहाँ पर महान् अधिप भगवान् वासुदेव से जो कि अमित आत्मा वाले थे पूछा था कि आपने मुझ ब्राह्मण को प्रेरित किया था कि अपने वंश के लिए यह करो । और उन प्रभु ने उनसे कहा था ।३६-३८। शिष्य वशी देव स्वयंभुव है जो प्रत्यक्ष रूप से देखने वाला है और अणिमा आदि आठों सूक्ष्म अङ्गों से समन्वित रहते हैं ।३६। जोकि तिर्यग्वात आदि वर्षों से समस्त लोकों का भरण किया करते हैं । सात स्कन्धशाखाओं से भृत थे और विषयों से सर्व तो या जराजर युक्त थे जिसके मरुत् सप्त सप्तक संस्थित महाबल सूत तीनों व्यूहों का सत्र कर रहा था ।४०-४१। उपायों के शरीर धारी तेज का यहां पर धारण करता है । धारणाओं की प्राणाद्य पांच वृत्तियां अपनी वृत्तियों से युक्त थी ।४२। पूर्णमाणः शरीराणां धारणं यस्य कुर्वते । आकाशयोनिर्द्विगुणः शब्दस्पर्शसमन्वितः ॥४३ वाचोरणिः समाख्याता शब्दशास्त्रविचक्षणैः । भारत्याः श्लक्ष्णया सर्वान्मुनीन्प्रह्लादयन्निव ॥४४