भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सर्ग-वर्णनम् ] [ ३७

पुराणज्ञाः सुमनसः पुराणाश्रययुक्तया ।
पुराणनियता विप्राः कथामकथयद्विभुः ॥४५
एतत्सर्वं यथावृत्तमाख्यानं द्विजसत्तमाः ।
ऋषीणां च परं चैतल्लोकतत्त्वमनुत्तमम् ॥४६
ब्रह्मणा यत्पुरा प्रोक्तं पुराणं ज्ञानमुत्तमम् ।
देवतानामृषीणां च सर्वपापप्रमोचनम् ॥४७
विस्तरेणानुपूर्व्या च तस्य वक्ष्याम्यनुक्रमम् ॥४८

जिसका शरीरों का धारण को पूर्यमाण होता हुआ करता है । आकाश जिसकी योनि है वह द्विगुण है और शब्द तथा स्पर्श समन्वित ।४३। शब्द शास्त्र अर्थात् व्याकरण के विद्वानों के द्वारा वाग्घोरणि कही गयी है । परम नम्र और मधुर वाणी से सभी मुनिगणों को आनन्दित करते हुए ही ऐसा किया था ।४४। सुन्दर मन वाले जो पुराणों के ज्ञाता थे उन्होंने पुराणों के समाश्रय के युक्त होकर जो पुराणों के प्रवचन करने में नियत थे उनसे विभु ने कहा कही थी ।४५। हे द्विजश्रेष्ठो ! यह सब आख्यान जैसा भी हुआ था । ऋषियों का यह परम सर्वोत्तम लोक तत्त्व है ।४६। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने उत्तम ज्ञान पुराण कहा था वह देवताओं से और ऋषियों के सभी प्रकार के पापों का मोचन करने वाला है अब पूर्ण विस्तार से और आनुपूर्वी अर्थात् आरम्भ से अन्त तक क्रम से मैं अनुक्रम से बतलाऊंगा ।४७-४८।


सर्ग-वर्णनम्

शृणु तेषां कथां दिव्यां सर्वपापप्रमोचिनीम् ।
कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसंमताम् ॥१
य इमां धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः ।
स्ववंशं धारणं कृत्वा स्वर्गलोके महीयते ॥२
विश्वतारा या च पञ्च यथावत्तं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्यमानं निबोधार्थं पूर्वेषां कीर्तिवर्धनम् ॥३