संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुघ्नमेव च । कीर्त्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् ॥४ यस्मात्कल्पायते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः । तस्मै हिरण्यगर्भाय पुरुषायेश्वराय च ॥५ अजाय प्रथमायैव वरिष्ठाय प्रजासृजे । ब्रह्मणे लोकतन्त्राय नमस्कृत्य स्वयंभुवे ॥६ महदाद्यं विशेषांतं सवैरूप्यं सलक्षणम् । पञ्चप्रमाणं षट्श्रांतः पुरुषाधिष्ठितं च यत् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—समस्त पापों का प्रमोचन कर देने वाली उनकी परम दिव्य कथा का आप अब श्रवण कीजिए जो कि मेरे द्वारा कही जा रही है। यह कथा बहुत ही विचित्र है और श्रुति के संमत है। इसका प्रचुर अर्थ भी है ।१। जो पुरुष इस कथा को नित्य धारण किया करता है और बारम्बार इसका श्रवण किया करता है वह अपने वंश को धारण करके अन्त में स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है ।२। जिस प्रकार से हुआ है और जैसा सुना गया है जो यह पंच विश्व तारा है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए कीर्त्तित किया हुआ यह पूर्व में होने बालों की कीर्त्ति का बढ़ाने वाला है ।३। यह परम धन्यपण देने वाला —आयु के बढ़ाने वाला—स्वर्गलोक प्राप्त कराने वाला और शत्रुओं का नाशक है । स्थिर कीर्ति से युक्त-पुण्य कर्मों वाले सबका कीर्त्तन करना इन उपर्युक्त सभी के देने वाला होता है ।४। जिसके कल्प भी कल्प का रूप धारण किया करता है और सम्पूर्ण शुचि के लिए भी शुचि है उन पुरुषों के स्वामी हिरण्यगर्भ के लिए जो अजन्मा है—सबसे प्रथम है—सबमें परमश्रेष्ठ है और प्रजाओं का सृजन करने वाले हैं उन लोक तन्त्र स्वयम्भू ब्रह्माजी के लिए नमस्कार है ।५-६। जो महत् का आदि में होने वाला है, जो विशेष के अन्त वाला है जो वैरुप्य से युक्त है-जो लक्षण वाला है—जो पांच प्रणामों वाला है-जो षट् श्रान्त है और पुरुषाधिष्ठित है ।७।
आसंयमात्प्रवक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् । अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम् ॥८ प्रधानं प्रकृतिं चैव यमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ।